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मेरा जीवन तेरे हवाले प्रभु इसे पग पग तू ही सम्हाले!
March 25, 2020 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय • विशेष

       

    डॉ जगदीश गाँधी

संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ


(1) मेरा जीवन तेरे हवाले प्रभु इसे पग पग तू ही सम्हाले:-
मानव मन को यह प्रश्न सदैव से विचलित करता आया है कि जब परमात्मा दयालु है तो उसने संसार को दुखों से क्यांे भर रखा है? मनुष्य का शरीर भौतिक है तथा उसका चिन्तन आध्यात्मिक है। जब मनुष्य का शरीर के साथ ही चिन्तन भी भौतिक बन जाता है। तब जीवन दुखों से घिर जाने के कारण हमारे कदम जीवन यात्रा में लड़खड़ाने लगते है। संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसको कोई दुख न हो। एक दुख खत्म होने के बाद दूसरा, दूसरा दुख खत्म होने के बाद तीसरा अर्थात जीवन में एक के बाद एक अनेक दुख आते-जाते ही रहते हैं। हर हाल में प्रभु की शरण में जाने में ही भलाई हैं। एकमात्र परमात्मा ही हमारे लड़खड़ाते कदमों को पुनः सम्भालने की शक्ति रखता है। बस सच्चे हृदय से ‘सब सौंप दो प्यारे प्रभु को सब सरल हो जायेगा। खुशियों की सुन्दर झील में जीवन कमल खिल जायेगा।’
(2) परमात्मा से बढ़कर कोई करूणानिधान नहीं है:-
इसलिए परमात्मा के लिए एक भजन में कहा गया है कि हे करूणानिधि यह करूणा कर दो, कोई तुझसा और करूणानिधान नहीं। कोई दीन दुखी पुकारे तू सुनता है प्रभु सदा उसकी। सुख धाम सदा तेरा नाम सदा कोई तुझसा और महान नहीं।
(3) शरीर तथा ब्रह्मांण्ड में पांच तत्वों का समावेश हैं:-
दुख दैहिक, दैविक तथा भौतिक अनेक प्रकार के होते हंै। जीव प्राणी, प्रकृति तथा परमात्मा इन तीनों का तत्व ज्ञान होने से जीवन में शारीरिक, दैवी तथा भौतिक दुख नहीं आते हैं। यह मानव शरीर पांच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश तथा वायु से मिलकर बना है। ब्रह्माण्ड में भी इन पांच तत्वों का समावेश हैं। परमात्मा आत्म तत्व है। वह अपने सभी गुणों के साथ मनुष्य के हृदय में वास करता हैं। प्रकृति, जीव तथा परमात्मा का तत्व ज्ञान होने से मनुष्य शारीरिक, दैवी तथा भौतिक दुखों से ऊपर उठ जाता है।
(4) आध्यात्मिक विजय प्राप्त करने के लिए प्रति पल शक्ति एकत्रित करनी:-
दुःख न बाजार में बिकता है और न बाजार से खरीदा जा सकता है। आज ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे बहुत से लोग दुःखी हैं। मेरे मन की पीर कोई जाने न, मैं जांनू या तू जांने, तमाशेगीर कोई जाने न। पीर हृदय में होती है। किसी के हृदय के दुःख को परमात्मा ही जान सकता है और उसे परमात्मा ही दूर कर सकता है। परमात्मा की शरण में जाकर ही मुक्ति है।
(5) ब्रह्माण्ड के रचयिता का अपना कोई मकान नहीं:-
मनुष्य के लिए सारी सृष्टि की रचना करने वाले परम पिता परमात्मा का अपना कोई मकान नहीं है। परमात्मा ने अपनी आत्मा से संसार के प्रथम स्त्री-पुरूष को विवाह करके उत्पन्न किया। परमात्मा ने मनुष्य के लिए यह सुन्दर सृष्टि- प्रकृति बनायी और उसे सभी संसाधनों से भर दिया। साथ ही अपना तथा मनुष्य का कर्तव्य निर्धारित कर दिया। परमात्मा ने मनुष्य का कर्तव्य यह निर्धारित किया कि एक शुद्ध, दयालु एवं ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय धारण करना ताकि परमात्मा अपने सारे गुणों के साथ हमारे हृदय में वास कर सके।
(6) परमात्मा हमारे हृदयरूपी मकान में रहता है:-
इस प्रकार परमात्मा ने अपने मकान के रूप में मनुष्य के शुद्ध, दयालु तथा प्रकाशित हृदय को चुना। प्रेम गलि अति साॅकरी जा में द्वे न समाय। परमात्मा के हृदय रूपी मकान में केवल एक ही के लिए रहने के स्थान है या तो हम अपने हृदय में अपनी इच्छाओं रूपी स्वार्थ को रख ले या स्वार्थ रहित हृदय धारण करके परमात्मा को रख ले। परमात्मा हमारे हृदयरूपी मकान में रहता है। हम स्वार्थ को भर के रोजाना अनेक बार जब चाहे अपने हृदयरूपी मकान से परमात्मा को निकालते रहते हैं। परमात्मा दयालु है वह बार-बार हमारे हृदय रूपी मकान से निकाले जाने के बाद भी जब भी हम उसे स्वार्थरहित होकर पुकारते हैं  वह एक क्षण की देर किये वगैर अपने सभी गुणों के साथ दौड़ा चला आता है।
(7) केवल परमात्मा को अपने मन-मंदिर में बैठाल ले:-
केवल परमात्मा को अपने मन-मंदिर में बैठाल ले तो वह एक सच्चे मित्र की तरह हर पल हमें मार्गदर्शन देगा। परमात्मा के हर पल साथ में रहने से भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों लाभ प्राप्त हो जाते हैं। संसार में रहना है तो बुद्धिमान तथा युक्तिवान बने। पति-पत्नी को एक-दूसरे के अच्छे गुणों की तारीफ करनी चाहिए। एक-दूसरे से छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ने से परिवार का वातावरण बिगड़ जाता है। रूखे तथा कलह से भरे पारिवारिक वातावरण में बच्चों का संतुलित विकास नहीं हो पाता है। परिवार की एकता के लिए बहुत धैर्य की आवश्यकता है।
(8) मन-मंदिर के परमात्मा की ओर लौटने का बहुत ही बढ़िया क्षण है:-
मनुष्य की एक-एक करके सभी पुरानी मान्यतायें-विश्वास चूर-चूर होकर धरासायी हो रहे हैं। इसी प्रकार मनुष्य के एक-एक करके सारे बाहरी सहारे भी टूट रहे हैं। जब तक सभी सहारे टूट नहीं जाते तब तक मनुष्य परमात्मा की ओर नहीं लौटता। आज का यह विषम समय अपने मन-मंदिर के परमात्मा की ओर लौटने का बहुत ही बढ़िया क्षण है।
(9) प्रभु इच्छाओं के पालन के बिना कोई उपाय नही है:-
प्रिय मित्रों, सारा महाभारत युद्ध हमारे अन्तःकरण में ही लड़ा जा रहा है। बस धैर्यपूर्वक तथा युक्तिपूर्वक अपनी अन्तरिक कमजोरियों पर ही आध्यात्मिक विजय प्राप्त करने के लिए प्रति पल शक्ति एकत्रित करनी है। प्रभु इच्छाओं के पालन के बिना कोई उपाय नही है। बस अपने मन-मंदिर में निवास करने वाले परमात्मा को अपना मान लें। हम तो परमात्मा को पराया मानते है। सारा खेल मन का है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। कोई एक बात, एक शब्द, एक चित्र, एक नाटक देख कर बस एक पल में मन बदल सकता है।