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महामारी ने किसानों को केले की खेती छोड़ने को किया मजबूर
March 5, 2020 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय • कविता

                                                           

                                                                                                                 

                                                        शैलेंद्र राजन निदेशक
                                                 केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान,

                                                                  रहमानखेड़ा, लखनऊ 226101z                 

       

केले की खेती से लखपति बने किसान उत्साहित होकर लीज पर ली हुई जमीन पर बड़ी संख्या में खेती करने लगे हें परंतु पनामा विल्ट के कारण लाखों रुपए की क्षति ने उनका उत्साह ठंडा कर दिया | केले की यह महामारी उत्तर प्रदेश और बिहार के महराजगंज, संत कबीरनगर, अयोध्या, अम्बेडकरनगर आदि  जिलों पर तेजी से फैल रही है| मुख्यतः अच्छे केला उत्पादक क्षेत्रों में इसकी उपस्थिति पाई जा रही है | इस बीमारी ने किसानों के लिए विकट स्थिति उत्पन्न कर दी है क्योंकि केले से मिलने वाले अधिक लाभ को वे छोड़ नहीं सकते और इसकी खेती में लगने वाली अधिक लागत के कारण रोग वाले क्षेत्र में खेती करने का जोखिम भी नहीं उठा सकते हैं | विगत 3 वर्षों में लखनऊ में स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शोध संस्थानों ने इस बीमारी की रोकथाम का कारगर उपाय विकसित करने के लिए बीड़ा उठाया और सफलता भी प्राप्त की |

केंद्रीय लवणता मृदा लवणता क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र एवं केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमान खेड़ा के वैज्ञानिकों ने इस रोग के प्रबंधन के लिए आईसीआर-फुसिकांट नामक प्रौद्योगिकी का विकास किया| इसके उपयोग से उत्तर प्रदेश और बिहार के सैकड़ों एकड़ रोग ग्रस्त खेतों में बीमारी को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया गया | विश्व में यह बीमारी बहुत सारे देशों में व्याप्त है और वहां इसक रोकथाम रोकथाम के लिए कोई कारगर उपाय अभी तक उपलब्ध नहीं है | आमतौर पर इस बीमारी को एक खेत से दूसरे खेत तक न फैलने देने के लिए रखने वाली सावधानियों से ही किसानों को अवगत कराया जाता है | विदेशों में संघरोधी सिद्धांतों को ध्यान में रखकर किसान महामारी को अन्य क्षेत्रों में फैलने से रोकने के आंशिक रूप से सफल है परंतु भारतीय दिशाओं में किसानों द्वारा इन अनुशंसा को अपनाना कठिन है | इसका कारण मुख्य कम जानकारी एवं संसाधनों की कमी है जिसके कारण वे केले जैसी अत्याधिक लाभ देने वाली फसल को छोड़कर दूसरी फसल को लगाने के लिए तैयार नहीं है साथ ही साथ बीमारी के प्रबंधन के लिए छोटी-छोटी सावधानियों के बारे में उन्हें ना तो ज्ञान है ना ही वे इसे कार्य रूप में लाने में विश्वास रखते हैं |

अधिकतर किसानों ने महामारी से निराशा के कारण केले की खेती छोड़ने का निर्णय लिया है| कई किसान तो कई किलोमीटर दूर जहां यह बीमारी नहीं है केले की खेती करने को विवश हो गए हैं ऐसी स्थिति में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने महामारी वाले क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम प्रारंभ किया | जागरूकता के अतिरिक्त किसानों को आईसीआर- फुजिकांट भी प्रदान किया और इस दवाई के प्रयोग की विधि के बारे में विस्तार से बताया | किसानों को केले की खेती में इस बीमारी के कारण आने वाली समस्याओं से अवगत कराने के अतिरिक्त बीमारी के कुप्रभाव को कैसे कम किया जाए विशेष रुप से समझाया गया | इस कार्यक्रम के दौरान डॉ रामगोपाल ने किसानों को बताया कैसे बीमार पौधे को पहचाने और आईसीआर- फुजिकांट का सही विधि से प्रयोग करें | डॉक्टर दामोदरन ने इस बीमारी के विभिन्न पहलुओं से किसानों को अवगत कराया तथा किस प्रकार से वह इस बीमारी के प्रकोप हो जाने वावजूद भी अच्छी उपज ले सकते हैं पर अपने अनुभव साझा किए | डॉ राजन ने बताया कि यह बीमारी सामूहिक रूप से नियंत्रित की जा सकती है अतः सभी किसानों को मिलकर सामुदायिक नियंत्रण कार्य योजना बनानी चाहिए | किसानों ने डॉक्टर दामोदरन से बहुत से ऐसे प्रश्न किए क्योंकि वे इस बीमारी से कई वर्षों से जूझ कर अच्छा अनुभव प्राप्त कर चुके हैं| वे कई कंपनियों की दवाइयों का इस्तेमाल करके निराशा के बाद आईसीआर- फुजिकांट के उपयोग की प्रयोग की सही विधि जानना चाहते हैं | बहुत सी  कंपनियों ने यहां के किसानों को विभिन्न प्रकार के रसायन को प्रयोग में लाने के लिए उत्साहित किया जिस कारण उन्हें तो लाखों रुपए की आय हो गई परंतु किसान को इतना घाटा हुआ की वे अपनी लागत मूल्य भी नहीं निकाल पाए|

इस कार्यक्रम का आयोजन गडेरुआ (सिसवा बाज़ार, महराजगंज) में किया गया और इसके आयोजन के लिए माटी फाउंडेशन ने किसानों में जागरूकता एवं संपर्क किया | माटी फाउंडेशन द्वारा आईसीआर- फुजिकांट टेक्नोलॉजी को कई एकड़ में प्रदर्शित किया गया और किसानों ने प्रदर्शन स्वयं देख कर अनुभव प्राप्त किया | इस प्रकार की जागरूकता कार्यक्रम का लाभ रोग से जूझ रहे किसानों को तो मिलता ही है साथ ही साथ जो साथियों को महामारी से जूझते हुए देख देख कर खेती प्रारंभ करने में डरते हैं उनका मनोबल भी बढ़ता है| किसानों की विशेष मांग यह की इस असाध्य बीमारी को वैज्ञानिक अपने निर्देशन में किसानों के खेत पर प्रदर्शित करें जिससे लोगों को प्रौद्योगिकी की तकनीकी का विस्तृत ज्ञान हो और हतोत्साहित किसानों के का मनोबल भी  बढ़े|
उत्तर प्रदेश केले के उत्पादक में उत्पादन में एक अग्रणी प्रदेश की श्रेणी में आ गया है और यहां के हजारों किसानों का जीवन यापन इसकी खेती पर 

निर्भर है | इस महामारी से होने वाली करोड़ों रुपए की क्षति को रोकने के लिए किसानों में जागरूकता अति आवश्यक है | जानकारी के साथ-साथ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित तकनीकी के सहायता से इस महामारी से लड़ा जा सकता है | निकट भविष्य में उत्तर प्रदेश को केले के उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए यह कदम अति आवश्यक है क्योंकि परंपरागत रूप से उच्च क्वालिटी केला उत्पादक क्षेत्रों में यह बीमारी अपना पैर पसार रही है | किसानों और वैज्ञानिकों का यह कर्तव्य है कि इस बीमारी को उन क्षेत्रों में फैलने से रोके जहां पर किसानों को इसका सामना नहीं करना पड़ रहा है और वह केले की खेती से प्रति एकड़ कई लाख रुपए का लाभ प्राप्त करें कर रहे हैं |