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कुक्कुट पालन में रानीखेत बीमारी का प्रकोप , उपचार एंव प्रबंधन
July 28, 2020 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय • पशुपालन


  डा. ए.के. सिंह  एंव  ’’डा. नरेन्द्र रघुवंशी 

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रानीखेत एक अत्यअधिक घातक और संक्रामक रोग है यह प्लेग के समान है। यह रोग कुक्कुट-पालन की सबसे गम्भीर विषाणु बीमारियो मे से एक है इस रोग के विषाणु ‘‘पैरामाइक्सो’’ को सबसे पहले वैज्ञानिको ने वर्ष 1639-40 मे उत्तराखंण्ड भारत के रानीखेत शहर मे चिन्हित किया था। रानीखेत रोग बहुत से पक्षियो जैसे- मुर्गी, टर्की, बत्तख आदि मे देखने को मिलता है लेकिन यह रोग प्रमुख रुप से मुर्गियो को प्रभावित करता है। यह सभी उम्र की मुर्गियों को हो सकता है परन्तु इस रोग का प्रकोप प्रथम से तीसरे साप्ताह में ज्यादा देखने को मिलता है। रानीखेत रोग का संक्रमण लगभग दुनिया के सभी देशो मे देखने को मिलता है। भारत मे रानीखेत रोग के नमूने सभी राज्यो के विभिन्न भागो मे देखने को मिलते है, लेकिन मुख्य रुप से दक्षिण एंव पश्चिम भारत जैसे- अंान्ध्र प्रदेश, कर्नााटक, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश आदि में कई बार देखने को मिलता है। इस रोग को हम न्यूकैसल रोग नाम से भी जानते है। इस रोग से मुर्गी पालको को बहुत हानि होती है। यह मुर्गियो की सबसे अधिक खतरनाक बीमारी है। बीमारी के उग्र रुप धारण करने पर बिना किसी लक्षण प्रकट किये हुए बहुत सी मुर्गिया तुरन्त एंव अचानक मर जाती है, क्योकि यह बीमारी अचानक होने लगती है ओर मुर्गियों में जल्दी फैलती है। इस रोग के कारण मुर्गियों को सांस लेने मे कठिनाई होने लगती है यह बीमारी सभी उम्र की मुर्गियों में पायी जाती है। तथा उनमें जल्दी महामारी का रुप धारण कर लेती है। इस रोग के लक्षणो मे आंख सुज जाती है, मुर्गियों की गर्दन एक तरफ मुड़ जाती है, कुछ बीमार मुर्गिया खड़ी नही हो पाती है और पड़ी रहती है। बीमार मुर्गियों को सफेद पीले एंव हरे रंग की दस्त होने लगती है। बीमार मुर्गियां दाना-पानी कम लेती है ओर 24-48 घंटे के अन्दर मर जाती है। बीमारी तीब्र होने पर 50-60 प्रतिशत मुर्गियां मर जाती है। विषाणुजनित रोग मुर्गियांे में अधिक होने के कारण मृत्युदर 75-80 प्रतिशत तक हो सकती है।
डाक्टर के द्वारा मरी हुई मुर्गियों का पोस्टमार्टम (शव परीक्षण) कराना चाहिये शव परीक्षण में प्रोवंेटीकुलस मे रक्त प्रवाह पाया जाता है और अंातो मे अल्सर या घाव दिखाई देता है प्रयोगशाला में प्रभावित मुर्गियों का खुन जंाच करने पर बीमारी को चिन्हित किया जा सकता है। मरी मुर्गियों का फेफड़ा, प्लीहा, और मस्तिस्क को प्रयोगशाला मे परीक्षण द्वारा इस विषाणु की पहचान की जा सकती है। 
विवरण:-

रानीखेत रोग का कारण एक नाकारात्मक और एकल असहाय आर एन ए विषाणु है ओर इस रोग का मुख्य कारण एवियन पायरामायको वाइरस टाइप 1 विषाणु है रानीखेत रोग का संचारण पक्षियो मे अन्य संक्रमित पक्षियो के मल, दूषित वायू, और उनके दूषित पदार्थ पानी, उपकरण, दूषित वैक्सिन, कपड़े आदि के स्र्पश से फैलता है। इस रोग के लक्षण दिखाई देने के कुछ दिनो बाद पक्षियो कि मृत्यु हो जाती है। इस रोग से 30 से 40 प्रतिशत तक मुर्गियों कि मृत्यु हो जाती है अगर यह रोग उच्च स्तर पर आता है तो 100 प्रतिशत तक मुर्गियों कि मृत्यु हो जाती है। इस रोग का प्रकोप मुर्गियों मे 2 से 5 दिनो तक होता है लेकिन मुर्गियों कि कुछ नस्लों में प्रकोप 25 दिनो तक देखा गया है। रानीखेत रोग कुक्कुट-पालन को विभिन्न प्रकार से आर्थिक नूकसान हाँनि पहुँचाता है। जैसे मुर्गियों की मृत्युदर तेज हो जाती है, शरीर भार मे कमी होती है, अंण्डा उत्तपादन मे कमी होती है, प्रजनन संबन्धी हानि होती है और उपचार संबन्धी लागत आदि इन सब बातो को ध्यान मे रखते हुए कुक्कुट-पालन करने वाले किसान भाईयो कों रानीखेत रोग का समय पर निम्न निदान और उपचार करना चाहिये।
रोग के लक्षण:- रानीखेत बीमारी हो जाने पर निम्न लक्षण मुर्गियों में परिलक्षित होते है। 
* इस रोग मे तिब्र ज्वर होता है आधा चोच खोलकर तथा गर्दन उठाकर जल्दी जल्दी मुर्गिया सांस लेती है तथा सीटी जैसा आवाज निकालती है। सर्दी हो जाती है तथा सदैव छींके आती है और भुख प्यास बंद हो जाती है। मुर्गियों का दिमाग प्रभावित होने लगता है शरीर का संतुलन लड़खड़ाता है और गर्दन लुढ़कने लगती है, छींको के साथ खंासी आना शुरु हो जाती है।
* सांस नली कें प्रभावित होने से सांस लेने मे तकलीफ होती है कभी कभी शरीर के किसी हिस्से को लकवा मार जाता है।
* प्रभावित मुर्गिया आकाश की ओर देखने लगती है पाचन तंत्र प्रभावित होने पर अतिसार (डायरिया) की स्थिति बनती है और मुर्गिया पतले एंव हरे रंग का दस्त करने लगती है। डायरिया के चलते लीवर भी खराब हो जाता है।
रोग का निदान:- इस रोग की कोई दवा नही है फिर भी दूसरे रोगो कंे संक्रमण से बचने का उपाय करना चाहिये। रोग के निदान के लिये निम्न बातो का उपयोग किया जाता है।
* सर्वप्रथम किसान भाईयो को कुक्कुट-पालन शुरु करने से पहले अच्छी तरह से मुर्गियो के रहन-सहन खाने पीने आदि का अध्धयन कर लेना चाहिये मुर्गीघर और घर के आस पास की अच्छी तरह से सफाई कर लेनी चाहिये। 
* कुक्कुट-पालन निदान प्रयोगशाला में एलिशा ओर पी.सी. आर. विधि से रक्त की जाँच करके रोग से प्रभावित मुर्गियो को मुर्गियो के समूह से अलग कर लेना चाहिये।
उपचार:-

निम्नलिखित दवाइयो के उपयोग से रानीखेत रोग का उपचार एंव रोकथाम की जा सकती है। 
* टेरामाईसीन, औक्सीस्टेक्लिन, उलीसाइक्लिन, आलसाइक्लिन, टेट्रासाइक्लिन आदि किसी एक दवा का 1-2 मि.ली. बड़ी मुर्गियों कों तथा 0.5 मि.ली. छोटी मुर्गियों कों मांस में सुई देना चाहिये अच्छा रहेगा कि निकट के पशु चिकित्सक से इलाज कराए।
* इस घातक रोग से बचाव के लिये किसानो और मुर्गीपालको के पास सिर्फ टीकाकरण ही एक मात्र उपाय है। यह टीकाकरण स्वस्थ पंक्षियो मे सुबह के समय करना चाहिये और इन्हे रोग से प्रभावित पक्षियो से अलग कर देना चाहिये।

* सबसे पहले इन्हे एफ-वन लाइव या लासोता लाइव स्ट्रेन वैक्सीन की खुराक 5 से 7 दिन पर देना चाहिये और दूसरी आर बी स्ट्रेन की बूस्टर डोज 8 से 9 हफ्ते और 16 से 20 हफ्ते की आयू पर वैक्सीनेशन करना चाहिये।

* रोग उभरने के बाद यदि तुरन्त रानीखेत एफ वन नामक वैक्सीन दी जाय तो 24 से 48 घंटे में मुर्गियों की हालत सुधरने लगती है। वैक्सीन की खुराक हमे पक्षियों की आँख और नांक से देनी चाहिये। अगर मुर्गीफार्म बड़े भाग में किया गया है तो वैक्सीन को पानी के साथ मिलाकर भी दे सकते है।
रोकथाम एंव नियंत्रण:- वर्तमान समय में इस रोग को जड़ से खत्म करने वाली कोई भी दवा विकसित नही हो सकी है। परन्तु दवाइयो के प्रयोग से इस रोग को बड़े क्षेत्र में फैलने से रोका जा सकता है और इस रोग से होने वाले आर्थिक नुकसान का कम किया जा सकता है।
* कुक्कुट पालन शुरु करने से पहले क्षेत्र की जलवायू आदि का अध्धयन अच्छी तरह से कर लेना चाहिये और यह भी मालूम कर लेना चाहिये कि कभी पहले भी यह रोग ज्यादा प्रभावी तो नही रहा है।
* मुर्गी घर के दरवाजे के सामने पैर धोने के लिये उचित व्यवस्था होनी चाहिये।
* मुर्गी पालक कुछ सफाई संबंधी कार्य करने से इस रोग को काफी हद तक रोक सकते है जैसे- मुर्गी घर की सफाई, इन्क्यूबेटर की सफाई, बर्तनो की सफाई आदि। रोगित पक्षियों पर तत्काल ध्यान देना चाहिये और उनका उचित टीकाकरण करना चाहिये।
*रोग से प्रभावित पक्षियो को स्वस्थ पक्षियो से अलग कर देना चाहिये। बाहरी लोगो का  मुर्गी फार्म प्रवेश वर्जित होना चाहिये। 
*दो मुर्गी फार्मो के बीच की दूरी कम से कम 100-150 मीटर रखनी चाहिये। रोग से मरे हुए  पक्षियो को गडढे मे दबा या जला देना चाहिये।