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कर्ज न लेने वाले किसानों का क्या कुसूर? 
December 30, 2019 • डा. शिव राम पाण्डेय • विशेष


किसान बड़े ही स्वाभिमानी और खुद्दार  होते हैं। कर्ज लेना वह मरण तुल्य मानते हैं, मगर राजनीतिक दल उन्हें कर्ज तले दबा हुआ और मजबूर देखना चाहते हैं। उत्तर प्रदेया में योगी आदित्य नाथ की सरकार ने अपना चुनावी वादा पूरा करते हुए लघु एवं सीमान्त किसानों का कर्ज माफ करने का निर्णय लिया है । कर्जमाफी का लाभ उठाने वाले प्रायः वही किसान है जो कि इससे पूर्व भी संप्रग  सरकार अथवा समाजवादी सरकार में ककर्जमाफी का लाभ उठा चुके हैं। ऐसे किसान कर्ज प्रायः लेते ही इसलिए है कि भविश्य में आने वाली कोई सरकार वोट के चक्कर में उनके कर्ज को माफ कर देगी। इस पुवृति के चलते भी बैंकों का एन0पी0ए0 बढ़ रहा है। सवाल यह उठता है कि कर्ज न लेने वाले किसानों का कुसूर क्या है? अगर सरकार किसानों को राहत देना ही चाहती है तो उन ईमानदार किसानों को कोई राहत क्यों नहीं देती जो कि बैकों के कर्जदार नहीं है। 
                                 मुखिया मुख को चाहिए खान-पान में एक।
                       पालै पोसै सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।
सरकार यदि सूबे के गुनहगार किसानों पर दरियादिली दिखते हुए उनके कर्ज माफ कर सकती है तो निर्दोश (ऋण न लेने वाले) किसानों को भी राहत राशि  अथवा प्रोत्साहन राषि के तौर पर इन्हें भी उतना ही धनराषि प्रदान कर सकती है। इसके अलावा सरकार कृशि के लिए आधारभूत सुविधायें बढ़ाने पर जोर क्यों नहीं देती है? देश की 66 प्रतिशत खेती अब भी असिंचित है सरकार ने विगत वर्शो में बड़े जोर शोर से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का शुभारम्भ किया था ,ऐसा लग रहा था कि अब तो देश की सिंचन क्षमता में क्रांति ही आ जाएगी मगर हुआ क्या? अभी डी0आई0पी0 यानी डिस्ट्रिक्ट इरीगेशन प्लान ही नहीं बन पाये तो योजना क्या खाक परवान चढ़ेगी? यह सर्व विदित है कि कृषि घाटे का व्यवसाय है किसान इसे छोड़ना चाहता है मगर विकल्पहीनता के कारण मजबूरन उसे ढो रहा है। किसान को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने की बात क्यों नहीं की जाती? ग्रामीएा गोदाम की योजना चलाकर देष की कृशि उपज को सुरक्षित एवं संरक्षित करने की योजना क्यों नहीं बनाती?समर्थन मूल्य के नाम पर सरकारें कब तक उसके साथ छल करेंगी? ग्रामीण गोदाम योजना की चर्चा तो बहुत होती है मगर इस योजना को लागू कर देने से शायद बिचैलियों को तकलीफ हो जाये क्योंकि तब किसान इन गोदामों में अपने कृषि उत्पाद रख कर तब बेचेंगे जब कि उन्हे उसका लाभकारी मूल्य मिलेगा और बिचैलिये देखते रह जाएंगे इसलिए ससकार और उसके हुक्मरान ग्रामीण गोदाम की योजना को हमेशा बट्टेखाते में डाल देते है। देश की यदि कृषि विपणन व्यवस्था सुधर जाए तोे किसानों की किस्मत सुधर जाये मगर किसानों को सरकार हमेशा मजबूर बना कर रखना चाहती है। सरकार  किसानों को नवीनतम तकनीक अपनाने की सलाह दे रही है मगर किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों और नवीनतम  तकनीक से लैस कौन करेगा? क्या यह जिम्मदारी सरकार की नहीं है। हजार डढ़ हजार की लागत से बनने वाली अजेय हंस्यिा ही सरकार प्रत्येक किसान को वांछित मात्रा में मुहैया करा दे तो देश में कम्बाइन मशीनों से कटाई ,लाख जलाने और भूसा बर्बाद करने की प्रथा अपने -आप बन्द हो जाएगी। सरकारें जब बदलती है तो योजनाओं के नाम तो बड़ी जल्दी से बदल जाते है मगर सरकारों का काम और काम का तरीका नहीं बदलता है। किसानों के नाम पर फर्जी किसान हर वर्ष अरबों रुपये कृषि आय दिखा कर कर चोरी करते है मगर सरकार कभी इनकी कृषि उपज चेक करने की जरूरत नहीं महसूस करती।  सत्ता में होने पर यही राजनीतिक दल किसानों की जमीनें छीन कर उद्योगपतियों को दे देती हैं विकास के नाम पर महापुरुषों के  बड़े-बड़े स्मारक बनवाये जाते हैं, एक्सप्रेस वे बनवाये जाते हैं हर साल हजारों हैक्टेयर कृषि भूमि गैर कृषि कार्यो के लिए अधिग्रहीत की जा रही है इस प्रकार कैसे होगा देश में कृषि का विकास? क्या उत्तर प्रदेष की योगी सरकार इस मुद्दे पर भी कुछ विचार करेगी