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जीवन संघर्ष
March 23, 2020 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय • कहानी

     

डॉ शिव राम पाण्डेय

सदस्य बाल न्याय पीठ समिति

(प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट)


 जून का महीना शाम के पाँच बज रहे थे। न्यायालय बाल कल्याण समिति की मजेस्टेटियल  बेंच  उठने ही वाली थी कि चाइल्ड लाइन के मेम्बर एक नया केस लेकर आ गये।
12 वर्षीया एक बालिका को आर पी एफ वालों ने पकड़ा था और चाइल्ड लाइन के सुपुर्द कर दिया था। वह बालिका ट्रेन में ठण्डा पानी के बोतलें बेंचती थी। उसका अपराध यह भी था कि वह बिना टिकट भी थी।
 उस बालिका की सुपुर्दगी लेने के लिए उसकी माँ और बड़ी बहन भी आई हुई थी। महिला के साथ एक से चार वर्ष उम्र के तीन बच्चे भी थे। 
 न्यायालय में आते ही महिला रोने लगी। उसे यह भी नहीं पता था कि उसकी बेटी ने क्या अपराध किया है, और वह कहाँ आई है।
बात जब बालश्रम कराने की आई तो बच्चों की माँ ने अदालत से सवाल किया कि ‘‘ई का होत है साहेब! ‘हमरी बिटिया कौनौ कां न तो मारिस न ही गरियायिस। सीधी-साधी है हमार बिटिया। सबेरे ही घर से निकरि जाति है ट्रेनन मां ठण्डा पानी की बोतल बेंचै। कोई चोरी चमारी तो किहिस नाही, फिर काहें  का पकरि लिहो साहेब ? सभै लोग गरीबन कां ही सतावत हैं। तमाम लोग तो गाड़ी माँ पानी बेंचत हैं ओनका तौं कौनै नाहीं पकरता है’’
 बात जब बच्चीं से की गई तो उसने बताया कि वह कक्षा 5 में पढ़ती है। घर में घनघोर गरीबी है, मैं पानी बेंच कर रोज चार पाँच सौ रुपये कमा लेती हूँ। उसी से घर पर सबके भोजन का इंतजाम होता है। जब स्कूल खुल जाएँगे तो मैं चार घंटे, स्कूल की पढ़ाई करके आने के बाद ही केवल चार घंटे पानी बेचूँंगी। मैं पढ़ाई भी करती हूँ और कमाई भी करती हूँ। मुझे नहीं मालूम की पढ़ाई और कमाई साथ-साथ करना कोई अपराध है।
 बालिका ने अपना इरादा साफ बता दिया। उसकी बड़ी बहन भी कोर्ट में मौजूद थी उसने कोर्ट से माफी माँंगते हुए बताया कि साहब हम लोग चार बहनें तीन भाई और माँ समेत आठ लोग है। फिता जी गत वर्ष एक दुर्घटना में दिवंगत हो गये। उनकी मौत के बाद से माँ प्रायः बीमार रहती है।
 सात बहन भाइयों में सबसे बड़ी मैं ही हूँ। गरीबी के कारण मैं भी ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाई केवल कक्षा पाँच तक पढ़ पाई हूँ।
पिता जी की मौत के बाद रहीम चाचा ने अपनी जान-पहचान वाले एक वर्मा जी के एक स्कूल में मुझे आया के पद पर रखवा दिया है। 1500 रुपये महीना मिलता है। हजार रुपये तो हम लोगों को घर का भाड़ा दे देना पड़ता है। ऐसे में क्या करें सहाब?
 पापी पेट का सवाल है पेट भरने के लिए कुछ तो करना ही पडे़गा।
आप ही लोग बताऐ  हम क्या करें? कहां जायें। रहीम चाचा के सिवा हमारा अपना कोई नहीं है।
 कोर्ट ने उसकी दुख भरी कहानी इत्मीनान से सुनने के बाद पूछा कि तुम्हारी माँ का आधार कार्ड कुशीनगर के पते पर बना हुआ है। तुम लीगों का कुशीनगर से क्या रिश्ता है? और तुम लोग कुशीनगर से इतनी दूर बाराबंकी में क्यों रहती हो ?
 बालिका बोली यह बड़ी दुख भरी कहानी है साहब! पहले हमारा सब कुछ कुशी नगर ही था मगर अब वहाँ हमारा कुछ भी नहीं। एक मात्र ठिकाना बाराबंकी है और रहीम चाचा हैं ।
 न्यायालय ने कहा कि तुम अपनी कहानी विस्तार से सुनाओ। हमसे जो भी हो पाएगा हम तुम्हारी मदद करेंगे। अदालत के कहने पर बालिका और उसकी माँ  ने अपना जीवन संघर्ष इस प्रकार बताया।
  धिरौली बाबू, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद में ठाकुरों का एक सम्पन्न गाँव है। काली प्रसाद गुप्ता की उसी गाँंव में किराने की दुकान थी। अच्छी चलती थी उनकी दुकान। गाँव का धान गेहूँ और दलहनी उपज काली प्रसाद ही खरीदते थे। लोग सरकारी विक्रय केन्द्रों पर जाने की झंझट से बचने के लिए अपने कृषि उत्पाद काली प्रसाद के यहाँ ही बेंचते थे। पैसा नगद मिल जाता था। काली प्रसाद अपने मीठे बोल की बदौलत 100 किलो की खरीद पर दो चार किलो धान-गेहूँ  मुफ़्त  में ही मार ले जाते थे। उनकी दुकान का सामान बाजार से दो पैसा मँहगा ही होता था पर गाँंव में ही मिल जाने के कारण गाँंव वाले सारा सौदा काली प्रसाद से ही खरीदते थे।
 गाँंव के कुछ आलसी और शौकीन ठाकुरों की छोटी -मोटी जमीनें सस्ते में खरीद कर काली प्रसाद अब बनिया से सेठ बन चुके थे।
 काली प्रसाद के दो बेटे थे, घमालू औ मकालू। घमालू बड़े बेटे का नाम है सो दुकान के काम में पिता जी का हाथ वही बंटाते थे। काली प्रसाद बोल-चाल मे ंमीठे,सरल स्वभाव के दिखते थे,मगर ठग और कुटिल दोनों थे। जिस घर पर काली प्रसाद की उधारी हजार दो हजार से ऊपर पहुँच जाती थी काली प्रसाद पहले उसका खेत रेहन पर लेते थे और बाद में सवा सेर गेहूँ की कहानी की तरह ब्याज इतना बढ़ जाता था कि कर्जदार को कुछ ही दिनों में अपना खेत रेहन में रखवा देना पड़ता और ब्याज ज्यादा बढ़ जाने पर खेत बैनामा ही करना पड़ता था। 
 अपनी इसी चालाक नीति के चलते काली प्रसाद कुछ वर्षो में बड़े काश्तकार भी बन गये। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था मगर न जाने किस की आह लगी कि काली प्रसाद को दिमागी बुखार ने इस कदर जकड़ा कि जान लेकर ही उनका पिण्ड छोड़ा। चार दिन की ही बीमारी में उनकी मौत हो गइ्र्र।
 काली प्रसाद के स्वर्गवास के बाद उनके दोनों बेटों घमालू और मकालू ने उनका कारोबार ठीक से संभाल लिया। घमालू दुकान का काम संभाल रहे थे और मकालू खेती की जिम्मेदारी देख रह थे। दोनों भाइयों की शादी हो चुकी थी। दोनों के अपने बाल बच्चे थे। परिवार सुखी था।
 पता नहीं पिता की काली करतूतों का फल था या मकालू के ही कर्मोंकी सजा , एक दिन मकालू अपने ही टैक्टर से गिरकर उसके नीचे दब गये और बुरी तरह से घायल हो गये। इस दुर्घटना में उसका दाहिना हाथ भी चला गया।
 मकालू को ठीक होने में साल भर लग गया इस बीच घमालू ने एक ट्रैक्टर ड्राइवर और सिरवार रख कर खेती का भी काम संभाल लिया जबकि दुकान का सारा कारोबार तो घमालू के ही अधीन शुरू से था। यानी की पिता की सारी विरासत अब घमालू के हाथ में थी। बदले हालात में अब घमालू को अपना ही छोटा भाई मकालू और उसका परिवार बोझ लगने लगा था।
 घमालू की पत्नी मकालू की पत्नी को रोज ताने मरती, कहती कि मकालू के इलाज में डेढ़ लाख रुपये खर्च हो गये। दुकान पर उधारी बहुत बढ़ गई हैं मकालू तो अब कुछ नही कर पाते। ‘‘काम के न काज के दुश्मन आनाज के’’ तुम लोगों को हम लोग कब तक बैठाल कर खिलायेंगे।
 मकालू की पत्नी विमला रक्त के  आँसू पी कर चुप रह जाती। एक तो बीमार पति की लाचारी, और ऊपर से आमदनी का कोई जरिया  नहीं । जेठानी के ताने सुन-सुन कर उसका मन घायल हो जाता। मगर वह बहरी बन कर सब कुछ सह जाती न तो जेठानी को जवाब देती और न ही कभी मकालू से इन बातो का जिक्र करती। घर के काम काज में लगी रहती दिन भर, इसके बावजूद बड़ी उपेक्षा के साथ दो टाइम का खाना उसे,मकालू और उसके बच्चों को मिल पाता।
 एक दिन मकालू ने अपनी भाभी की तानाकशी सुन लिया। वह विमला से कह रही थी ‘‘तुम लोगों को शर्म भी नही आती, पति निठल्ला बैठा है, चार-चार बच्चे पैदा कर लिया किससे बूते पर? तुम लोगों को लाज शर्म भी नहीं आती, कब तक हमारे ऊपर बोझ बने रहोगे तुम लोग ? कहीं डूब धंस कर मर क्यों नहीं जाते।’’ इतनी चुटीली बातें सुनकर भी विमला चुप रह गई। मगर मकालू का शरीर मारे क्रोध के झनझना उठा। उसने तत्काल अपने बड़े भाई घमालू से बात किया बोला भैया हमारा बंटवारा कर दो, भाभी कहती हैं  मैं और हमारे बच्चे आप पर बोझ हैं। 
 घमालू बोले तो गलत क्या कह रहीं  तुम्हारी भाभी। बोझ तो हो ही तुम लोग हम पर। बड़ा जोश आ रहा है। तो छोड़ कर चले जाओ घर।घर छोड़कर क्यों चले जायें? आप हमारा बंटवारा कर दो, हमारा भी तो हिस्सा है। हम लोग आप लोगों पर बोझ नहीं बनना चाहते। आप हमारा आधा हिस्सा अलग कर दो भैया, हम जैसे कैसे जी खा लेंगें। अब हम बोझ नहीं बनेंगे आप लोगों पर।
 मकालू की बात पर धूर्तता पूर्वक हंसते हुए बोला घमालू- हिस्सा, कैसा हिस्सा? दुकान हमारी है, उसे हम देख रहे हैं  उसमें तुम्हारा कोई हिस्सा होता नहीं, एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा उसमें। रही बात खेत की तो उसमें तुम्हारा हिस्सा है मगर तुम्हारी बीमारी पर डेढ़ लाख रुपया कर्ज लेकर खर्च किया है। ब्याज सहित ढ़ाई लाख रुपया हो गया जिस दिन ढ़ाई लाख रुपया अदा कर देना उस दिन आकर खेत में ले लेना आधा हिस्सा।
 बड़े भाई की बात सुनकर मकालू के तो पैर के नीचे से धरती ही खिसक गई। बावजूद इसके मकालू ने घमालू से रिश्ते का वास्ता देते हुए कुछ और बात करना चाहा मगर घमालू ने डाँंटते हुए- कहा निकल जाओं मेरे घर से। जब ब्याज समेत मेरे पैसे लौंटाने की हैशियत हो जाएगी तब आकर मुझसे बात करना। 
 इसके बाद घमालू ने मकालू और उसके परिवार को घर से जबरन बाहर कर दिया।
 मकालू बड़े पशोपेश में पड़ गया। अगर यहाँ पर कहीं मेहनत मजदूरी करता हूँ तो गाँंव -जवार के लोग मजाक उड़ायंेगे कि ‘‘देखो काली सेठ का लड़का मजदूरी कर रहा है। पिता जी का नाम खराब होगा। लोग भइया के बारे में भी चार बातें उल्टी सीधी करेंगे। बेहतर होगा कि यहाँ से कहीं दूर चले जायें। भगवान ने मुंँह दिया है पेट दिया है तो उसे भरने का भी कोई न कोई जरिया अवश्य देगा। उसने भगवान भरोसे घर छोड़ने का निर्णय लिया।
 पत्नी और चार बेटियों के साथ मकालू बिना टिकट कुशीनगर एक्सप्रेस में सवार हो गया। न कोई मंजिल थी न कोई ठिकाना। कानपुर या लखनऊ जाने का इरादा था मगर टीटी भी ट्रेन में गरीबों का टिकट जरूर चेक करते हैं । कुछ ही दूर आने के बाद मकालू के पास भी टीटी टिकट-टिकट करते पहुँच गया। कोच की फर्श पर बैठे मकालू ने साफ कह दिया साहब टिकट तो नहीं है हमारे पास।
 टीटी गरजा-तो ट्रेन क्या तुम्हारे बाप की है? क्या सोच कर सवार हो गये बिना टिकट? जेल जाना पड़ेगा,
 ठीक है साहब जेल ही भेज दो, कोई तो मंजिल मिलेगी। वहाँ पर तो कम से कम भोजन तो मिलेगा ही। टीटी पशोपेश में पड़ गया। उसने सोचा था कि कुछ कमाई हो जाएगी मगर यहाँ तो मामला उल्टा पड़ गया। एक नहीं पाँच-पाँच लोगों को जेल भेजना था एक को महिला बंदी गृह, चारो बच्चों को बाल बंदी गृह बालिका और एक को सामान्य कारागार में डालना था। 
 बड़ा झंझट का काम था, मन में पाप पुण्य का भाव जगने लगा। उसने नौकरी को दाँव पर लगा कर उन पाँचों को ट्रेन में बैठा रहने दिया और बाराबंकी स्टेशन पर टेªन पहुँचने के बाद उसने मकालू से कहा कि अब हम तुम्हें और आगे नहीं ले जा सकते,आगे खतरा है ,पकड़े जाओगे सभी लोग, इतनी चेतावनी देकर उन्हें ट्रेन से वहीं पर उतार दिया।
जीड़ों की रात थी, मकालू उसकी पत्नी और बच्चे भरा-पूरा परिवार लेकिन बेसहारा। एक से 10 वर्ष आयु के चार बच्चे मैले-कुचैले फटे- पुराने वस्त्रों के बीच अपनी गरीबी और अधनंगी शरीर ढकने का असफल प्रयास। लाचार माँ-बाप न रहने का ठिकाना और न खाने पीने का कोई प्रबंध।
 मकालू के मन में अन्तद्र्वन्द चल रहा था नाहक भैया से झगड़ लिये, अपाहिज हूँ जैसे-तैसे वहाँं बच्चों को भोजन तो मिल ही रहा था हिकारत भरी जिन्दगी थी मगर अपमान करने वाले कम से कम अपने तो थे।
 मगर अब, अब तो पेट पालने का भी कोई इंतजाम नहीं है। तब तक ट्रेन से उतरी एक मैडम ने अपनी टिफिन का बचा हुआ खाना भिखारी समझ कर मकालू के सामने डाल दिया। भूख से बिलखने। चारों बच्चें उस खाने पर टूट पड़े। मकालू के व्याकुल मन को थोड़ी राहत मिली।
 कहतेे है न ‘‘देखा-देखी पाप और देखा-देखी पुण्य’’ कई और यात्रियों ने भी अपने पास का बचा खाना उन बच्चों के सामने डाल दिया और बच्चे खा पी कर अघा गये। मकालू और उसकी पत्नी के लिए भी चार निवाला बच गया वे दोनों भी थोड़ा खाकर बाकी पानी पीकर पेट भर लिये। सिकुड़ते ठिठुरते चारो बच्चे सो गये। और वह पति पत्नी दोनो रात भर जागते रहे।
 मकालू दोनों हाथ ऊपर उठाकर ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था हे भगवान तू वास्तव में बड़ा दयालु है भोजन देते समय तुमने न तो राष्ट्रवाद का प्रमाण-पत्र माँगा और न ही आधार कार्ड और पैन कार्ड मांँगा। तूने मेरी जाति, धर्म, गोत्र और नागरिकता का प्रमाण-पत्र भी नहीं माँगा। तू धन्य है। तेरा लाख-लाख शुक्रिया प्रभु।
 बाराबंकी स्टेशन पर रात भर ट्रेनों का आवागमन बना रहता है। सो रात भर में यात्रियों द्वारा की गई एक दो और पाँच रुपये की मदद से मकालू के पास सबेरे तक 75 रुपये एकत्र हो गये थे।
कुल जमा 75 रुपये की  पूँजी में भविष्य की योजना दें। सबेरा हो चुका था। एकबार सोचा बच्चों को जगा दें। उन्हें चाय बगैरह पिला दें। जबरन बाहर निकाल दिया।
मकालू बड़े पशोपेश में पड़ गया। अगर यहां पर कही मेहनत मजदूरी करता हूँ तो गांव जवार के लोग मजाक उड़ायेगे कि ‘‘देखों काली सेठ का लड़का मजदूरी कर रहा है। पिता जी का नाम खराब होगा लोग भइया के बारे में भी चार बातें उल्टी सीधी करेंगे। बेहतर होगा कि यहां से कही दूर चले जायें। भगवान ने मुंह दिया है परे दिया हे तो उसे भरने का भी कोई न कोई जरिया अवश्य देगा।
पत्नी और चार बेटियों के साथ मकालू बिना टिकट कुशी नगर एक्सप्रेस में सवार हो गया। न कोई मंजिल थी न कोई ठिकाना। टीटी भी ट्रेन में गरीबों का टिकट जरूर चेक करते है। कुछ ही दूर आने के बाद मकालू के पास भी टीटी टिकट टिकट करते पहुँच गया। कोच की फर्श पर बैठे मकालू ने साफ कर दिया साहब टिकट तो नहीं है।
टीटी गरजा- तो जेल जाना पड़ेगा
ठीक है साहब जेल ही भेज दो कोई तो मंजिल मिलेगी वहां न तो भोजन भी मिलेगा। टीटी पशोपेश में पड़ गया। कुसने सोचा कुछ कमाई हो जाएगी मगर यहां तो मामला उल्टा पड़ गया। एक नहीं पाँच-पाँच लोगों को जेल भेजना था एक महिला बंदी गृह चार को बाल बंदी गृह बालिका और एक सामान कारागार में डालना था। बड़ा झंझट का काम था, मन में पाप पुष्प् का भाव जाने लगा। उसने उन पाँचों को बाराबंकी स्टेशन पर  पहुँचने के बाद उत्तर दिया।
जीड़ों की रात थी, मकालू उसकी पत्नी और बच्चे भरापूरा परिवार लेकिन बेसहारा। एक से 10 वर्ष आयु के चार बच्चे मैले कुचैले फटे वस्त्रों के बीच से अधनंगी शरीर। लाचार मां बाप न रहने का ठिकाना और न खाने पीने का कोई प्रबंध।
मकालू के मन में अन्तद्र्वन्द चल रहा था नाहक भैया से झगड़ लिये, अपाहिज हूँ जैसे तैसे वहां  बच्चों को भोजन तो मिल रहा था हिकारत भरी जिन्दगी थी मगर अपमान करने वाले कम से कम अपने तो थे।
मगर अब, अब तो परे पार ने का भी कोई इंतजाम नहीं है। तब तक ट्रेन से उतरी एक मैडम ने अपनी टिफिन का बचा खाना भिखारी समझ कर मकालू के सामने डाल भूख से बिलखने। चारों बच्चें उस खाने पर टूट पड़े। मकालू के मन को थोड़ी रहित हुई।
कहने है न ‘‘देखी देखा याद देखी देखा पुष्य’’ कई और यात्रियों ने भी अपने पास का बचा खाना उन बच्चों के सामने डाल दिया और बच्चे खा पी कर अंधा गये। मकालू और उसकी पत्नी के लिए भी चार निवाला बच गया वे दोनों भी थोड़ा खाकर बाची पानी पीकर पेट भर लिये। सिकुड़ते ठिठुरते चारों बच्चे सो गये। वह दोनों पति पत्नी रात भर जागते रहे।
 मकालू दोनों हाथ ऊपर उठाकर ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था हे भगवान तू वास्तव में बड़ा दयालु है भोजन देते समय तुमने न तो राष्ट्रवाद का प्रमाण-पत्र मांगा और न ही आधार कार्ड और पैन कार्ड मांगा। तूने मेरी जाति, धर्म, गोग और नागरिकता का प्रमाण-पत्र भी नहीं मांगा। तू धन्य है। तेरा लाख लाख शुक्रिया प्रभु।
 बाराबंकी स्टेशन पर रात भर ट्रेनों का आवागमन बना रहता है। सो रात भर में यात्रियों द्वारा की गई एक दो और पाँच रुपये की मदद से मकालू के पास सबेरे तक 75 रुपये एकत्र हो गये थे। कुल जमा 75 रुपये की पूँजी  में भविष्य की योजना कैसे बने। 
 सबेरा हो चुका था। एकबार सोचा बच्चों को जगा दें। उन्हें चाय बगैरह पिला दें। फिर सोचा ऐसा करने पर तो उसकी आधी पूंजी लुट जाएगी।  उधर उसकी पत्नी सबेरे उठ नित्य क्रिया से निवृत होकर पहुँ गई जी आर पी थाने और वहां की साफ-सफाई झाड़ू बुहारू करने लगी तो थाना इंचार्ज ने रोक दिया, पूछा कौन हो तुम सफाई करने तो दूसरी वाई आती है, तुझे तो यहाँ पहली बार देख रहा हूँ। विमला घबरा गई दरोगा के सवाल का जवाब भी न दे पाई।
 उसकी पत्नी सबेरे उठ कर नित्य क्रिया से निवृत होकर आ गई औेर जी आर पी थाने की साफ सफाई झाड़ू बुहारू करने लगी झाड़ू की आहट सुन कर थाना इंचार्ज का तंद्रा भंग हुई और बाहर निकले तो उसे झाड़ू लगाने से रोक दिया, और पूछा कौन हो तुम ? सफाई करने तो दूसरी बाई आती है, तुझे तो यहांँ पहली बार देख रहा हूँ। विमला घबरा गई दरोगा के सवाल का जवाब भी नहीं दे पाई, शब्द गले में ही अटक गये।
 दरोगा जी ने अब और कड़क आवाज में पूछा कौन हो तुम ? कहाँ रहती हो, किसने भेजा यहाँ तुम्हे ? दूर से नजारा देख रहा मकालू बच्चों को अकेले सोता छोड़कर जी आर पी थाने पर पहुँच गया और दरोगा जी से चिरौरी करते हुए उनको उस महिला का परिचय दिया और आप बीती भी सुनाई।
 दरोगा को मकालू की बातों में कुछ सच्चाई नजर आई उनका दिल थोड़ा पसीजा और मकालू से बोले तो क्या इरादा है। क्या करना चाहते हो।
 मैं कर ही क्या सकता हूँ साहब। क्या करने लायक हूँ मैं। हाँ मगर ऊपर वाले पर भरोसा है, वह जो करवायेगा वही करूँगा। 
उसका जवाब सुन कर कुछ सोच-विचार में पड़ गये दरोगा जी।
 तब तक पास की दुकान से कल्लू चाय वाला आ गया उसने आवाज दी ‘‘साहब चाय’’।
दरोगा जी की तंद्रा उसकी आवाज से भंग हो गई।
अचाचक कर बोले-हाँ चाय लाओ, दो कप और देना, उन्होंने मकालू और उसकी पत्नी की ओर इशारा करते हुए- इन्हें भी चाय पिलाओं और जरा रहीम को भेज देना मेरे पास। दरोगा जी ने हाथ में चाय का कप उठाते हुए कहा- देखो क्या नाम बताया तुम्हारा ?
 जी सर! मकालू। मकालू ने दरोगा के प्रश्न का उत्तर दिया।
 देखो मकालू! मैं तुम्हारी कोई बड़ी मदद तो नहीं कर सकता मगर तुम्हें कुछ छोटा-मोटा काम दिलाने की कोशिश कर सकता हूँ, करोगे? 
 क्यों नहीं साहब बिना कुछ किये कोई रोज-रोज थोड़े न मेहरबानी करेगा, आप जो हुक्म करोगे मैं करुंगा। इस बीच रहीम आ गया।
सलाम सर- उसने दरोगा का अभिवादन किया।
 हांँ हाँ ठीक है- बैठो रहीम, तुमसे कुछ बात करनी है मुझे। दरोगा ने कहा और मकालू तथा उसकी पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए बोले चाय पियो आप लोग।
 मकालू जी हुजूर!हमारे चार बच्चे भूखे सोये हैं  उधर वेेटिंग रुम के पास, इजाजत हो आपकी तो ये चाय हम बच्चों को पिला दें। बिना बच्चों को कुछ खिलाये अपने हलक के नीचे कुछ उतरता ही नहीं है साहब।
 अरे तो तुमने पहले क्यों नहीं बताया। ठीक है तुम लोग चाय पिओ हम उनका भी कुछ इन्तजाम करते हैं। अरे रहीम जरा लौण्ंडे को आवाज लगाकर चार चाय- चार टोस्ट और मँंगा दो पैसा थाने के बिल में जोड़ देना। लो अब तुम लोग चाय पिओ, तुम्हारे बच्चों का भी इंतजाम हो गया है।
 रहीम ने वहीं बैठे बैठे दुकान के हेड कुक को आवाज लगाया और दरोगा जी द्वारा बताई गईं चीजें लाने का आर्डर दे दिया।
 अब तक मकालू और उसकी पत्नी भी चाय पी चुके थे। दरोगा जीे भी चाय सुड़क कर रहीम की ओर मुखातिब होते हुए बोले -
रहीम भाई्र हम तुम्हें एक काम से बुलायें है ।
 जी फरमायें हुजूर क्या सेवा कर सकता हूँ आपकी, रहीम ने कहा। 
रहीम सेवा नहीं सहयोग की जरूरत है दरोगा जी बोले।
 देखो ये दोनों जो बैठे है न, इन्हें काम की तलाश है जरुरतमंद लोग हैं, गरीब और बेसहारा हैं। इसके साथ इनके चार बच्चे भी है। खाने रहने का कोई ठिकाना नहीं है इनके पास। 
तुम इन दोनों को अपनी दुकान पर रख लो। दोनो फुल टाइम तुम्हारा काम करेंगे । तुम इन दोनों और इनके बच्चों को भोजन दे देना दोनों टाइम। कोई पगार नहीं देना है इनको बस इतनी सी मेहरबानी कर दो।
 रहीम -जैसा हुक्म हो हुजूर,इसमें मेहरबानी की क्या  बात है। वैसे काम करने वाले तो थे हमारे पास, मगर आप की बात नहीं कटेगी हुजूर। काम पर लगा लेंगे हम इन्हें। आज से ही बल्कि अभी से। इतना कह कर उसने मकालू से कहा कि चलो, वो सामने वाली दुकान है अपनी। मैं अभी पहुँच रहा हूँ।
तब तक दुकान का लड़का चार चाय और टोस्ट लेकर वहीं पहुँच गया। रहीम  दरोगा से बोला हुजूर नाश्ता आ गया है, दरोगा ने लड़के से कहा -चले जाओ उधर, और वो जो बच्चे बेटिंग रुम के पास बैठे हैं  उन्हें चाय और टोस्ट दे आओ। 
                                                              x   x    x   x   x   
 मकालू और विमला दोनों रहीम के होटल में लग गये। मकालू को टेबिल सर्विस का काम मिला और उसकी पत्नी की जिम्मेदारी बर्तन धोने की थी। दिन भर दोनों वहीं पर रहते, ड्यूटी करते खाते-पीते और रात में 12 बजे से भोर में चार बजे तक रात्रि विश्राम का समय था। दो ही लोग काम करने वाले थेे मगर भोजन बच्चों को भी मिल जाता। गृहस्थी की गाड़ी जैसे-तैसे खिंचने लगी।
 बच्चे दिन भर स्टेशन पर टहलते रहते। कोई न कोई दया-धर्मी निराश्रित समझ कर उन्हें भी दो-चार रुपये दे देता। बच्चों को मिलने वाले पैसों से ही धीर-धीरे मकालू के पास हजार रुपये की पूँजी इकट्ठा हो गयी।
 दो काम करने वाले और खाने वाले रहीम मियां रहमदिल जरूर थे मगर थे तो व्यवसायी ही। कभी-कभी मकालू को ताना भी मार देते कि तुम्हारी फौज को हम कब तक बिठाल कर खिलायेंगे। हमारे पास इतना काम भी तो नहीं है कि कहीं इन्हें भी काम पर लगा दूँ। तुम्हारी बड़ी बेटी तो अब 10 वर्ष की हो गई है, कहो तो जालिम से कह कर उसे भी उसके होटल पर काम पर लगवां दूँ।
 नहीं साहब थोड़ा दिन और सब्र करो मैं कोई और बन्दोबस्त करता हूँ।
 क्यों जालिम के होटल पर काम करने में क्या बुराई है। रहीम ने सवाल किया।
 बुराई है साहब! जालिम वाकई में बड़ा जालिम है वह आपकी तरह नेक और रहमदिल नहीं है। दुकान पर काम करने वाले बच्चों को लातों से मारता है, भद्दी भद्दी गालियांँ देता है, रोज-रोज का बखेड़ा, मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा ,मकालू ने रहीम से कहा फिर क्या करोगे? रहीम ने सवाल किया।
 मकालू ने कहा साहब एक बात कहूँ आप बुरा तो नहीं मानोगे।
 हां हां कहो, बुरा क्यों मानूँगा, मैं भी तो इंसान ही हूँ। रहीम ने मकालू को आश्वस्त किया।
 मकालू बोला अभी तक अपने होटल की चाय सिर्फ स्टेशन पर बिकती है, मैं सोचता हूँ एक कंटेनर की व्यवस्था हो जाये तो मैं आपके होटल से चाय लेकर ट्रेनों में बेंचा करूँ । एक चाय पर तीन रुपये का मुनाफा होगा। मुनाफे का हम लोग आधा-आधा कर लेंगे।
 आइडिया तो ठीक है मगर जब तुम ट्रेन में चाय बेचने लगोगे तो यहाँं पर टेबिल सर्बिस का काम कौन करेगा?रहीन सवाल किया। 
 रज्जो करेगी साहब। जालिम के यहाँ काम करने से बेहतर होगा कि वह यहीं पर अपनी माँ के साथ काम करेगी।
 मकालू की बात रहीम को जँच गई। बोले ठीक है मकालू तुम ठीक सोच रहे हो। रज्जो बेटी अब यहीं अपने होटल पर काम करेगी अपनी माँ के साथ, और तुम ट्रेनों में  चाय बेचोगे।
मगर एक शर्त है-रहीम बोला।
 मकालू शर्त की बात सुनकर बड़े असमंजस में पड़ गया। घबरा कर बोला शर्त! क्या शर्त है साहब।
 घबराओ नहीं मकालू। मैं व्यवसाई जरुर हूँ मगर इंसान भी हूँ। कोई ऐसी ब्ढ़ी षर्त नही है जिसे पूरा  करना तुम्हारे लिए मुष्किल  होे। जो चाय हम दुकान पर पांँच रुपये में बेंचते हैं उसकी वास्तविक लागत केवल तीन रुपये आती है एक रुपये हम सेवा का और एक रुपये मुनाफे का लेते हंै। हम तुम्हें चाय तीन रुपये कप की दर से दंेगे। न तुम से सेवा का पैसा लूँगा और न मुनाफा का, तुम मुझे केवल तीन रुपये कप के दर से ही भुगतान करना बाकी सारा पैसा तुम्हारा। मुझे ऊपर वाला बहुत दे रहा है। तुम्हारी कमाई का मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।
 घबराये हुए मकालू ने राहत की सांस ली और रहीम के पैरों में गिर पड़ा। बोला साहब आप आदमी नहीं देवता है। बड़ी मेहरबानी है आप की मुझ पर एक गैरइंसान के लिए कौन करता है इतना,मकालू ने कहा।
 पता नहीं, मैनें कभी देवता तो देखा नही, हांँ मगर अब कभी अपने को गैर मत कहना। साल भर से है हमारी तुम्हारी जान पहचान तो हम गैर कैसे हुए? रहीम ने मकालू से सवाल किया।
 खैर चलो तैयार हो जाओ मकालू अब तुम्हारी योजना की रणनीति पर काम करते हैं । कन्टेनर तो है मेरे पास। कम से कम 100-150 कप चाय आएगी उसमें ।  एक घंटे बाद बाम्बे वी. टी.  ट्रेन  आने वाली है। उसमे चलने वाले टीटी से मेरी जान-पहचान भी है। मैं टीटी साहब से बोल भी दूँगा। देखना जनरल डिब्बे में ही चाय बेंचना। मैं अजीम से बोलउकर चाय बनवा दे रहा हूँ। तुम तैयार हो जाओ। आज से ही विसमिल्ला कर दो, नये काम का।
 मकालू ने फटाफट नहा-धोकर पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाया। हनुमान चालीसा का पाठ किया और चाय का कन्टेनर लेकर बाम्बे वी.टी. ट्रेन  पर सवार हो गया।
 अधकपटी गीत और चाय-चाय की आवाज के साथ उसने जीवन की दूसरी पारी शुरू कर दिया।
 एक विकलांग का जीवन संघर्ष और मीठे मीठे भोजपुरी गीतोें के मुखड़े का अधूरा गायन, बारबस ही यात्रियों को अपनी और आकर्षित कर लेता। जिसकी इच्छा नहीं होती वह भी चाय की फरमाइश कर देता। चार स्टेशन पार करते-करते उसकी सारी चाय बिक गई और उल्टी दिशा में आ रही ट्रेन पकड़ कर वह वापस आ गया रहीम की दुकान पर।
 उसे इतना जल्दी लौटा देख कर रहीम का दिल किसी आशंका से जोर-जोर धड़कने लगा। मकालू को आता देखकर वह खुद ही चल कर उसके पास पहुँच गये और बोले क्या हुआ मकालू ?, कोई बात तो नहीं, इतनी जल्दी कैसे आ गये?
 कोई बात नहीं साहब, चाय खत्म हो गई तो मैं वापस आ गया, मकालू ने जवाब दिया।
 अरे वाह मकालू। तू ने तो कमाल ही कर दिया। चलो अब एक चाय मेरी ओर से स्पेशल तुम्हारे लिए।
 मकालू और रहीम एक खाली बेन्च देख कर बैठ गये। रहीम ने नौकर को आवाज दिया अरे छोटू जरा दो कप चाय स्पेशल ले आना और कुछ नमकीन भी लाना।
बैठे-बैठे मकालू ने अपना दिन भर का यात्रा वृतान्त रहीम को सुना डाला और एक हजार दो सौ 32 रुपये निकाल कर रहीम को सौंप दिया।
 रहीम ने उन पैसों को अपने माथे से लगाया और उसके बाद उन  पैंसो  की गिनती की। तीन सौ 75 रुपये अपने पास रख कर रहीम ने  बाकी पैसे मकालू को लौटा दिया। मकालू तमाम न नुकुर करता रहा मगर रहीम ने कहा देखो मकालू व्यवसाय में हिसाब ही राजा होता है। मैंने जो शर्त रखा था उसका पालन मैं भी करूँगा और तुम भी करोगे।
 मकालू ने प्रति प्रश्न किया लेकिन साहब आपकी जो पूँजी लगी, उसका आपको क्या मिला साहब?
सवाब?रहीम ने जवाब दिया। एक बात याद रखना छंगा सवाब भी किस्मत वालों को ही मिलता है। 
टेªन में चाय बेंचने  का मकालू का धंधा चल निकला। उसकी चाय स्पेशल होती थी उसमें एक विशेष प्रकार की खुशबू होाती थी, वह अपनी चाय में थोडी सी जावित्री डाल देता था। जिससे उसकी चाय में  एक खास तरह खुशबू होती थी। जिससे ग्राहकों को प्रतीक्षा रहती थी उसके चाय की। उसके चाय की डेढ-दो हजार रुपये की विक्री रोज होने लगी थी।
 लोग कहते हैं पैसा आता है तो अक्ल भी आ जाती है। मकालू अब रहीम के होटल पर नहीं वहाँ से थोड़ी दूर पर किराये के मकान में रहने लगा था। विमला अब भी दिन में रहीम चाचा के होटल पर काम करती थी। मकालू ने बच्चों का नाम पास के  एक प्रायमरी स्कूल में लिखवा दिया था।
 रज्जों अब थोड़ी बड़ी हो गई थी और समझदार भी। अब वह अपने हाथों मसालेदार पकौड़े तैयार कर मकालू को चाय के साथ मकालू को पकड़ा देती और वही पकौडे़ वह रहीम चाचा की दुकान पर भी विक्री के लिए भिजवा देती।
 अब मकालू ट्रेन  में चाय के साथ पकौड़े भी बेचने लगा था। चार पांच घंटे में वह दो-ढाई हजार रुपये का बिजनेस करके लौट आता। जीवन की गाड़ी अब फिर से पटरी पर दोड़ने लगी थी।
 जीवन संघर्ष थोड़ा कम हुआ तो विमला को निपूती होने का दर्द सालने लगा। बेटियाँ तो चार-चार थीं मगर बेटा एक भी नहीं था। मन की बात मकालू से कही तो उसे भी लगा एक बेटा तो चाहिए ही वंश को आगे बढ़ाने के लिए। फिर क्या था मियां बीबी राजी ऊपर वाले की कारसाजी। एक-एक कर तीन वर्ष में ही तीन बेटे भी पैदा हो गये उसके।
अब मकालू के चार बेटियां और तीन बेटों समेत सात संताने थी । खाने पीने की कोई कमी नहीं थी। परिवार खुशहाल था, जिन्दगी आराम से गुजर रही थी। 
 बाल्यकाल घोर अभाव गुजरा इसलिए पाँचवीं कक्षा तक ही पढ़ पाई थी रज्जो, और अब 16 वर्ष की हो गई थी। अब उसे स्कूल में भेजना उचित नहीं थी उसकी देह यष्टि आकर्षक हो गई थी, इसलिए उससे होटल पर काम कराना भी उचित नही था। अतः मकालू ने उसे घर पर रखना उचित समझा। उसने विमला से कहा कि अब बच्चे बड़े हो रहे हैं । रज्जो (रंजनी) 16 वर्ष की हो गई है और कज्जो (काजल) 14 वर्ष की। अब इन्हें घर पर ही रख कर गृह-गृहस्थी के हुनर सिखाओ। जमाना बड़ा खराब है। अब इन बेटियों से घर के बाहर काम कराना ठीक नहीं है। खासतौर से स्टेशन और चाय के होटलों पर काम कराना तो कतई ठीक नहीं है। चाय की दुकानों पर तमाम छिछोरे शाहेदे बैठे रहते हैं। लड़कियाँ देखकर छींटाकशी करते रहते है।
 विमला ने मकालू की सलाह से सहमति जताया। मकालू ने विमला से कहा कि अब तुम भी रहीम चाचा की दुकान पर काम करना बन्द कर दो, घर पर ही रह कर बच्चों की देखभाल करो। लड़कियां बड़ी हो रही हैं, जमाना बड़ा खराब है सो समझदारी से काम लेना है। चार पैसे और इकट्ठा हो जायें तो कहीं ठीक-ठाक लड़का देखकर रज्जो (रंजनी) के हाथ पीले करने की जुगत करता हूँ।
 विमला बोली आपकी बात सोलह आने ठीक है मगर इस कदर काम छोड़ देने से रहीम चाचा नाराज हो जाएँगे। उन्होंने कदम-कदम पर हमारा साथ दिया है विपत्ति में।  उन्हें नाराज करना ठीक नहीं होगा। मकालू ने विमला की बात से सहमति जताते हुए कहा कि उसकी चिंता तुम मुझ पर छोड़ दो, हमारे साहब भले इंसान है। दुनिया की रीति-नीति से बाकिफ हैं । मैं कल ही उनसे बात करूँगा। वे नाराज नहीं होंगे।
 मैं तुम्हारी जगह एक दूसरी महिला को काम पर रखवा दूँगा। बड़ी दुखियारी है, बेचारी है। उसे भी चार पैसे का सहारा मिल जाएगा और रहीम चाचा की दुकान का काम भी प्रभावित नहीं होगा। मैं भी चार पाँच घंटे ही काम पर रहता हूँ। खाली समय में रहीम चाचा की दुकान पर रह कर काम कर दिया करूँगा। बड़ा एहसान है उनका हम पर। मैं उस काम का कोइ्र्र पैसा भी नहीं लूँगा।
 मकालू जबसे रहीम चाचा की दुकान पर फिर से बैठने लगा दुकान की बिक्री बढ़ गई। मकालू ने अपनी चाय का फार्मूला रहीम के होटल की चाय में भी लागू कर दिया। रहीम के दुकान की चाय रेवले के अधिकारियों और कर्मचारियों के भी मन को भाने लगी।
 अब ड्योढ़ा हो गई थी रहीम के होटल की बिक्री। एक दिन रहीम ने मकालू से आदेशात्मक स्वर में कहा कल से तुम इस दुकान पर नही बैठोगे, और अगर बैठना चाहते हो तो मेरी मेरी एक शर्त माननी होगी।
 मकालू अब भी रहीम को साहब कह कर ही संबोधित करता था बोला ठीक है साहब मैं दुकान पर बैठूँगा तो जरुर ,अब आप अपनी शर्त बताइए क्या है आपकी षर्त।
 रहीम ने कहा ठीक है- शर्त यह है कि मेरी दुकान पर बैठने और काम करने का तुम्हें पैसा लेना पड़ेगा या फिर मुनाफे में शेयर लेना होगा।
 कोई बात नहीं साहब! मैं दुकान पर बैठने का पैसा ले लूँगा पर मेरी भी एक शर्त है उसे मानना होगा आपको,बाद में मुकरना नहीं।
ठीक है तुम्हारी शर्त मंजूर-बोलो
 मैं मुहमांँगी कीमत  लूँगा  मकालू ने कहा।
 चलो ठीक है, अब बोलो कितना पैसा लोगे रोज।
 मकालू बोला आपकी दुकान पर काम करने की कीमत मुझे एक रुपये रोज चाहिए।
 मकालू की बात सुनकर उसे गले से लगा से लिया और रहीम  बोले तू तो अब चालाक भी हो गया है। तुम्हें बातंे बनाना भी आ गया।  ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी।
 अब रहीम की दुकान, मकालू का धंधा और घर परिवार सब ठीक-ठाक चल रहा था।
 बेटियों में रज्जो और कज्जो प्रायमरी तक पढ़ाई करके घर पर थीं। बचचे सरकारी प्रायमरी स्कूल में पढ़ रहे थे। बड़ी बेटियां सिलाई, कढ़ाई सीख कर घर पर ही बुटीक का कुछ काम किया करती थीं । मज्जो (मंजू) चैथी क्लास में पढ़ रही थी और गज्जो (गुंजन) तीसरी कक्षा में पढ़ती थी।
 गरीब जरुर थी मगर बच्चियाँ संस्कारवान थीं। और लड़के एक एक वर्ष के अन्तर पर पैदा हुए थे। सबसे छोटा वाला गोद में था। और बाकी के दोनों बेटे अभी स्कूल जाने लायक भी नहीं थे। 
इस प्रकार चल रहा थी मकालू के घर संसार को गाड़ी।
खुशहाली कहीं भी ज्यादा दिन टिकती है, नहीं लक्ष्मी की तरह चंचल है वह भी। मकालू के संघर्षमय जीवन में कुछ ही पल खुशियों के आये थे कि एक दिन ट्रेन की पायदान से फिसल कर मकालू पहियों के नीचे आ गया।
उसकी जीवन लीला के साथ ही उसका जीवन संघर्ष भी खत्म हो गया।
 जीवन संघर्ष की अब सारी जिम्मेदारी विमला की थी। रो-रो का बुरा हाल था उसका। बच्चों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि पापा को क्या हो गया।
 रहीम ने अपने पैसों से मकालू के अंतिम संस्कार का सारा प्रबंध किया। हिन्दू रीति रिवाज से मकालू की अंत्येष्टि की गई। उसकी शव यात्रा में हिन्दुओं से अधिक मुसलमान शामिल थे। रहीम चाचा का रो-रो कर बुरा हाल था। बार-बार यही कहते थे तुमने धोखा दिया।
मकालू पहले मुझे जाना था, मगर तुम बिना बताये चुपके से निकल गये। जब से मिले थे तुम सारे कार्य पहले से मुझे बता कर करते थे मगर एक यही काम तुमने मुझे बिना बताये किया। मैं तेरा कर्जदार हूँ मकालू, प्रयास करुँगा मैं तेरा कर्ज उतारने का। मगर अब तुम कोई शर्त नही लगाओगे। अब मैं जो कुछ भी करुंँगा अपनी ही शर्तो पर करुँगा।
 मकालू के दसवांँ तेरही का सारा प्रबंध रहींम ने किया सारे कार्यक्रम हिन्दू रीति रिवाज से निपटाये गये। सारे कार्यक्रम निपट जाने के बाद रहीम विमला के घर आये और जीवन संघर्ष के अगले सोपान की रणनीति बनी।
 नासिर मियाँ के माडल स्कूल में रहीम ने रज्जो को आया का काम दिला दिया और यह भी कह दिया कि रज्जो की हाई स्कूल तक पढ़ाई भी उसी स्कूल में जारी रही रहेगी। कज्जो सिलाई कढ़़ाई में कुछ ज्यादा ही काबिल थी। इसलिए उसे फैशन टेलर्स के यहांँ रखवा दिया। डेढ़ सौ रुपये दैनिक की दर से मजदूरी मिलती थी। पूरे परिवार का दिन का नाश्ता रहीम की दुकान से आ जाता।
मज्जो और गज्जो दोनों सरकारी प्रायमरी पाठशाला मैं पढ़ने जाने लगी थी बाकी बचे तीनो लड़के वे अभी स्कूल जाने की उम्र के थे ही नहीं। विमला रहीम के दुकान का काम अब केवल दिन में ही देखती थी।
तीन माह बाद रक्षा बंधन का पर्व आया।
 सबेरे सबेरे रहीम विमला के घर पर आ गये। एक हाथ में मिठाई का डिब्बा दूसरे हाथ में साड़ी का पैकेट और छोटे बच्चों के लिए कुछ खिलौने भी थे। विमला घर में कुछ काम कर रहीं थी। सो घर पहुँच कर रहीम ने आवाज लगाई- विमला बहन, बाहर आओ। साहब की आवाज! सबेरे सबेरे ये कहाँ आ गये ? मैं तो पहले ही बोल कर आयी थी कि आज श्रावण पूर्णिमा है त्योहार का दिन है मैं आज दुकान पर नहीं आऊँगी। विमला अपने आप से बातें करते हुए बाहर निकली और बिना माजरा समझे बोल पड़ी-साहब मैं तो कल बोल कर........ आयी थी........।
 हांँ बोल कर आयी थी कि तुम कल दुकान पर नहीं आओगी लेकिन रक्षाबंधन के दिन क्या भाई को नही जाना चाहिए बहन के घर ? रहीम की बातें सुन अवाक रह गई विमला। एकदम किंकर्तव्य विमूढ़। चैतन्य हुई तो रहीम को गले से लगा लिया भइया कह कर, लिपट गई उनसे। रहीम बोले चलो जल्दी करो बहन, राखी नहीं बांधोगी क्या मुझे?
 भइया!जरा ठहरो तो, अभी नहाई-धोई नहीं हूँ । मैं अभी आई पाँच मिनट में।विमला फटाफट नहा-धो कर तैयार हुई, भाई की कलाई पर राखी बांधा,मिठाई खिलाया और रो पड़ी।
 रहीम ने ढाँढस बंँधाया-बहन जीवन संघर्ष में तुम अकेली नहीं हो, यह भाई तुम्हारे साथ हर कदम पर है। हम मिल कर चुनौतियों का सामना करेंगे। मैं आजीवन तुम्हारे साथ हूँ।
 विमला उस दिन बहुत खुश थी। उसे लगा कि जीवन पथ अब सरल हो गया है। पति को खोया है तो आज गाढ़े दिन में एक मुँह बोला भाई मिल गया। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि एक दिन अचानक फोन आया कि मज्जो को पुलिस ने पकड़ लिया है। यह सुन कर विमला पर मानो पहाड़ टूट पड़ा। हड़बडी में उसने रहीम भाई को भी कुछ नही बताया। खबर मिलते ही कज्जों  के भरोसे धर छोड़ कर रज्जो और सबसे छोटे तीनों बच्चों (लड़कों) को साथ लेकर बाल कल्याण न्यायालय बस्ती के लिए दौड़ पड़ी। 
रज्जो से उसके घर-परिवार की सारी दास्तान सुनने के बाद न्यायालय ने मज्जो को उसकी माँ के सुपुर्द कर दिया और साथ ही यह हिदायत भी दे दिया कि बच्चे की शिक्षा एवं सम्पोषण का समुचित ध्यान रखेंगे। उससे बाल श्रम भी नहीं करवाएंगी।
 न्यायालय ने अपने दायित्व से एक कदम आगे बढ़ते हुए जिलाधिकारी कुशीनगर को एक पत्र भी लिखा कि मकालू की विधवा को उसके सारे राजस्व अधिकार और गरीबों के लिए संचालित सभी कल्याणकारी योजनाओं का समुचित लाभ दिलाने में मदद करें। न्यायालय ने जिलाधिकारी का लिखेे पत्र की प्रतिलिपि मुख्य विकास अधिकारी पुलिस अधीक्षक कुशीनगर स्थानीय थाने के प्रभारी,जिला प्रोवेशन अधिकारी को भी आवश्यक कार्यवाही के लिए कर दिया। विमला न्यायालय का आदेश एवं पत्र मिलने के बाद अपने बच्चों के साथ बाराबंकी वापस लौट गई।