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गया से आठ गुना फलदायी ब्रह्म कपाल है।
October 13, 2019 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय
 
                
 *शिवजी को भी यहीं मिली थी,पाप से मुक्ति ।*
      
*बद्रीनाथ धाम के तट पर बहती अलखनंदा में ब्रह्मकपाल के बाद मृत आत्माओं को मोक्ष मिल जाता है । इसके बाद कहीं भी कोई पितरों के लिए पिंडदान कराने की जरूरत नहीं होती है। सिर्फ श्राद्ध पक्ष में उनकी मृत्यु की तिथि पर किसी ब्राह्मण को भोजन कराना  होता है।पिंडदान के लिए भारतवर्ष क्या दुनियाँ भर से हिंदू भले ही प्रसिद्ध गया पहुँचते हों लेकिन एक तीर्थ ऐसा भी है जहाँ पर किया पिंडदान गया से भी आठ गुणा फलदायी है...*
 
*यही नहीं इसी तीर्थ स्थल पर भगवा‌न शिव को भी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी।चारों धामों में प्रमुख उत्तराखंड के बदरीनाथ के पास स्थित ब्रह्माकपाल के बारे में मान्यता है कि यहाँ पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को नरकलोक से मुक्ति मिल जाती है। स्कंद पुराण में ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुणा अधिक फलदायी पितरकारक तीर्थ कहा गया है।*
 
*सृष्टि की उत्पत्ति के समय जब तीन देवों में एक ब्रह्मा , माँ सरस्वती के रुप पर मोहित हो गए तो भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के पाँच सिरों में से एक को त्रिशूल के काट दिया। लेकिन ब्रह्या का सिर त्रिशूल पर ही चिपक गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शिव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया था। ब्रह्मा की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए तो बदरीनाथ से पांच सौ मीटर की दूरी पर त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर जमीन पर गिर गया तभी से यह स्थान ब्रह्म कपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। शिव जी ने इस स्थान को वरदान दिया कि यहाँ पर जो व्यक्ति श्राद्ध करेगा उसे प्रेत योनी में नहीं जाना पड़ेगा एवं उनके कई पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिल जाएगी।*
 
*भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत युद्घ समाप्त होने के बाद पाण्डवों को ब्रह्मकपाल में आकर पितरों का श्राद्घ करने का निर्देश दिया था। इसका कारण यह था कि महाभारत युद्घ में लाखों की संख्या में लोगों की मृत्यु हुई थी।*
 
*कई लोगों का विधि पूर्वक अंतिम संस्कार भी नहीं हो पाया था।ऐसे में अतृप्त आत्माओं को संतुष्ट करना आवश्यक हो गया था। इसलिए भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा मानकर पाण्डव बद्रीनाथ की शरण में आए और ब्रह्मकपाल में पितरों एवं युद्घ में मारे गए व्यक्तियों के लिए श्राद्घ किया।पुराणों में बताया गया है कि उत्तराखंड की धरती पर भगवान बद्रीनाथ के चरणों में बसा है ब्रह्म कपाल। अलकनंदा नदी ब्रह्मकपाल को पवित्र करती हुई यहाँ से प्रवाहित होती है। इस स्थान के विषय में मान्यता है कि इस स्थान पर जिस व्यक्ति का श्राद्ध कर्म होता है उसे प्रेत योनी से तत्काल मुक्ति मिल जाती है और भगवान विष्णु के परमधाम में उसे स्थान प्राप्त हो जाता है। जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती है उसकी आत्मा व्याकुल होकर भटकती रहती है। ब्रह्म कपाल में अकाल मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध करने से आत्मा को तत्काल शांति और प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है।*
 
        *!! पितृदेवाय नम:!!*