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देश में लगभग 40 लाख किसान कर रहे जीरो बजट खेती
October 5, 2020 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय • कृषि

उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (उपकार) द्वारा आज ष्भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धतिष् विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार के मुख्य अतिथि, मा0 श्री राज्यपाल आचार्य देवव्रत, गुजरात ने कहा कि प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किये जाने से जहरमुक्त कृषि से निजात मिलेगी एवं पर्यावरण भी स्वच्छ एवं शुद्ध होगा। उन्होंने बताया कि कुरूक्षेत्र के गुरूकुल में 200 एकड़ भूमि प्राकृतिक खेती हेतु विकसित की गयी है। रासायनिक खेती के 60 से 70 सालों के उपरान्त अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। यूरिया तथा डी.ए.पी. के प्रयोग से मृदा की उर्वरा शक्ति कम हो रही है तथा मृदा का जीवांश कार्बन अत्यन्त ही कम हो गया है जो चिन्ता का विषय है। इसके साथ-साथ रसायनों के उपयोग से मनुष्यों में बीमारियां  बढ़ रही हैं।
श्री देवव्रत ने इस सब समस्याओं के निदान हेतु जीरो बजट खेती पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि इस तकनीक से खेती की लागत लगभग शून्य होती है। यह कृषि पद्धति नवोन्मेषी है, जिसके माध्यम से वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी की जा सकती है। वर्तमान में देश में लगभग 40 लाख किसान इस विधि से खेती कर रहे हैं। प्राकृतिक खेती जैविक खेती से अलग है। प्राकृतिक कृषि में देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाकर उपयोग किया जाता है। इस विधि से खेती करने पर किसी भी अन्य खाद अथवा कीटनाशक की आवश्यकता नहीं होती है। इसके उपयोग से खेत की मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का भी विस्तार होता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री सूर्य प्रताप शाही, मा0 कृषि, कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान मंत्री ने कहा कि उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मृदा में कार्बनिक पदार्थ, जैविक गतिविधि में कमी आयी है तथा सिंचित खेती वाले क्षेत्रों में मृदा एवं सिंचाई के पानी की लवणता तथा अतिवृष्टि मृदा उत्पादकता की गिरावट के प्रमुख कारण हंै। वैश्विक जलवायु परिवर्तन का भी प्रभाव अब कृषि पर पड़ने लगा है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती से जहां एक ओर कृषि भूमि पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक रसायनों के प्रयोग से कृषि लागत में भी वृद्धि हो रही है। वर्तमान परिस्थितियों में न्यूनतम लागत खेती प्रथाओं ने किसानों की कृषि लागत में कमी की है और किसानों के लिए उच्च पैदावार, उपभोक्ताओं के लिए रसायन मुक्त भोजन और बेहतर मृदा उर्वरता का वादा किया है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में आज जैविक उत्पादों की मांग भी बढ़ी है और एक्सपोर्ट क्वालिटी उत्पाद होने के नाते उत्पाद का निर्यात अन्य देशों में किया जा रहा है। इससे जहां एक ओर किसानों की लागत में कमी आयी है, वहीं दूसरी ओर उनकी आमदनी में भी वृद्धि हुयी है।
श्री शाही ने बताया कि प्रदेश के 399 विकास खण्ड़ों में जीवांश कार्बन की मात्रा 0.25-0.35 प्रतिशत है, जबकि 421 विकास खण्ड़ों में जीवांश कार्बन की मात्रा 0.35-0.45 प्रतिशत की श्रेणी में आती है जो अत्यन्त चिन्तनीय है। जैविक खेती परियोजना के अन्तर्गत गंगा के तट पर स्थित 27 जनपदों का चयन किया गया है, जिसमें 16 कृषि विभाग (650 ग्राम पंचायत) तथा 11 यू.पी. डास्प (388 ग्राम पंचायत) के माध्यम से संचालित हैं। योजनान्तर्गत 56180 हे. क्षेत्रफल में 2809 क्लस्टर (प्रति क्लस्टर 20 हे. क्षेत्रफल) बनाये जा रहे हैं, जिसमें 76,008 कृषक सम्मिलित हैं। परियोजना के अन्तर्गत 03 वर्ष हेतु रूपये 302.19 करोड़ स्वीकृत हैं, जिसमें रूपये 32.86 करोड़ उपलब्ध हैं। उपलब्ध धनराशि के सापेक्ष रूपये 27.22 करोड़ व्यय किये जा चुके हैं।
अपर मुख्य सचिव कृषि, डा0 देवेश चतुर्वेदी ने कहा कि सभी मण्डलीय मण्डियों में दिन निर्धारित करते हुए एफ.पी.ओ. द्वारा वहांॅ जैविक उत्पादों की बिक्री की जा सकती है। उन्होंने बताया कि आर्गेनिक टेस्टिंग के लिये और भी लैब खोली जा रही हैं। उन्होंने कहा कि मण्डी परिषद में आर्गेनिक उत्पादों के परीक्षण हेतु कलेक्शन सेन्टर खोला जायेगा तथा इसकी टेस्टिंग बिना मूल्य के की जायेगी। उन्होंने उ.प्र. कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम को उत्साहवर्द्धक बताते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती को अन्य परियोजनाओं में भी सम्मिलित किया जायेगा। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती अपनाने से गोवंश में वृद्धि, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, रासायनिक उर्वरक के प्रयोग में कमी, फलस्वरूप कृषि लागत में कमी आयेगी तथा जैविक उत्पाद प्रयोग करने से मानव स्वास्थ्य में सुधार होगा।
मा0 अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद कैप्टन (से.नि.) विकास गुप्ता ने बताया कि उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक खाद्यान्न उत्पादक राज्य है एवं गेहूॅ, गन्ना, आम, आँवला , तरबूज, दुग्ध उत्पादन एवं सब्जी उत्पादन में देश में प्रथम स्थान प्राप्त है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस देश में रासायनिक खेती के बाद अब जैविक खेती सहित पर्यावरण हितैषी खेती, एग्रो इकोलाॅजिकल फार्मिंग, बायोडायनामिक फार्मिंग, वैकल्पिक खेती, प्राकृतिक खेती व जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैसी अनेक प्रकार की विधियाॅ अपनाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि जैविक खेती से ज्यादा सस्ती, सरल एवं ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करने वाली प्राकृतिक खेती व जीरो बजट प्राकृतिक खेती मानी जा रही है। उन्होेने इस बात पर विशेष बल दिया कि शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के दीर्घकालिक प्रभावों का वैज्ञानिक परीक्षण, उत्पादकता, उपज की गुणवत्ता एवं मृदा पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण किया जाना आवश्यक है।
कार्यक्रम में डा. बी.पी. सिंह, पूर्व निदेशक बीज प्रमाणीकरण संस्था, उ.प्र. द्वारा प्राकृतिक उत्पादों के प्रमाणीकरण तथा उनकी ब्रान्डिंग के विषय में विस्तार से प्रकाश डाला। डा. ए.पी. श्रीवास्तव, निदेशक, कृषि, उ.प्र. ने नमामि गंगे परियोजना में की जा प्राकृतिक खेती के सम्बन्ध में विस्तार से प्रकाश डाला।