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ये कहानी हर मध्यम व छोटे वर्ग के किसान की है
July 5, 2019 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय

कहते हैं..इन्सान सपना देखता है तो वो जरूर पूरा होता है.मगर किसान के सपने कभी पूरे नहीं होते बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है.बड़ा खुश होते हुए जाता है.बच्चों से कहता है आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा,
पत्नी से कहता है..


तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा.
पत्नी अरे नही जी..!
ये तो अभी ठीक है..!
आप तो अपने लिये
जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!
जब किसान मंडी पहुँचता है .ये उसकी मजबूरी है वह अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता.
व्यापारी उसके माल की कीमतअपने हिसाब से तय करते हैं.एक साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.एक माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.लेकिन किसान अपने माल की कीमत खुघ्द नहीं कर पाता .
खैर. माल बिक जाता है,लेकिन कीमत उसकी सोच के अनुरूप नहीं मिल पाती.माल तौलाई के बाद जब पेमेन्ट मिलता है
तो वह सोचता है  इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मजदूर को देना है ,अरे हाँ, बिजली का बिल भी तो जमा करना है. 
सारा हिसाब लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.वह मायूस हो घर लौट आता है
बच्चे उसे बाहर ही इन्तजार करते हुए मिल जाते हैं.पिताजी..! पिताजी..! कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं-
हमारे नये कपड़े नहीं लाये..?
पिता वो क्या है बेटा..,
कि बाजार में अच्छे
कपडे मिले ही नहीं,
दुकानदार कह रहा था
इस बार दिवाली पर अच्छे कपड़े आयेंगे तब ले लेंगे..!
पत्नी समझ जाती है, फसल कम भाव में बिकी है,वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.पति अरे हाँ..!तुम्हारी साड़ी
भी तो नहीं ला पाया..!
पत्नी कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे, लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!
पति अरे वो तो मैं भूल ही गया..! पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है फिर भी पति को दिलासा देती है .
और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती हुई रसोई की ओर चली जाती है ।
फिर अगले दिन सुबह फिर
पूरा परिवार एक नयी उम्मीद ,
एक नई आशा एक नये सपने के साथ
नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है।
यह कहानी हर छोटे और मध्यम किसानों के घर की है जो जन्दिगी में हर साल दोहराई जाती है
हम ये नहीं कहते कि हर बार फसल केसही दाम नहीं मिलते,लेकिन जब भी कभी दाम बढ़ें,मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं
और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं।
कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं..
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.वो किस तरह फसल को पानी देता है।
१५ लीटर दवाई से भरी हुई टंकीपीठ पर लाद छिङकाव करता है, 30 किलो खाद की तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर
फसल को खाद देता है.अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने केइन्तजार में जागता है.चिलचिलाती धूप में सिर का पसीना पैर तक बहाता है.
जहरीलेजीव जन्तुओंका डर होते भी खेतों में नंगे पैर घूमता हैजिस दिन यह वास्तविकता आप अपनी आँखों से देख लेंगे, उस दिन आपक ेकिचन में रखी हुई सब्जी,प्याज, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध सब सस्ते लगने लगेंगे.