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बकरियों में होने वाले प्रमुख रोग एवं बचाव
July 8, 2019 • डा0 अमरेश कुमार सिंह


भारतीय परिवेश में बकरी पालन एक ऐसा व्यवसाय है जो छोटे कृषकों के लिए लाभदायक होता है। बकरी पालन में कम खर्च और अधिक आय को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों मे अधिकांश कृषक परिवार इसको पालकर लाभ कमा रहे है बकरी पालन से अधिक लाभ लेने के लिए उनकी अच्छी देखभाल पोषक आहार और बिमारियों से बचाव आवश्यक होता है। बकरियों मे होने वाली बिमारियो से उनका बचाव करना अधिक लाभदायक है न कि रोग होने पर उपचार कराना। बकरियों में होने वाली प्रमुख बिमारियां इस प्रकार है।
1. पी0पी0आर0


यह छुआ-छूत की बिमारी  है  , जो विषाणुओं द्वारा होती है।
लक्षणः तेज बुखार, पतला पानी की तरह दस्त होना, अत्यधिक कमजोरी का होना, मुँह में छाले का पडना तथा नाक एवं आँख से पानी आना।
बचावः समय से टीकाकरण सर्वोत्तम उपाय है। बकरी/बकरा मेले से खरीदने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लें कि उसकों इस बिमारी का टीका लगा हो। लक्षण दिखाई पडने पर तत्काल पशुचिकित्सक को बतांए एवं चिकित्सीय परामर्श लें।
2. खुरपका-मुँंहपका


यह छुआछूत की बीमारी है, जो विषाणुओं द्वारा होती है।
लक्षण - तेज बुखार, मुंँह से लार का आना, मसूढ़ों एवं जीभ पर छालों का पड़ना और खुर में सूजन एवं छालों का होना।
बचाव- वर्षा ऋतु से पूर्व समय से टीकाकरण सर्वोत्तम उपाय है। खुर के छालों को लाल दवा (पोटेशियम परमैग्नेट) के 0.5 प्रतिशत पानी के घोल से साफ करना चाहिए तथा मुंह में बोरोग्लिसरीन लगायें। बीमारी के लक्षण होने पर पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लेना चाहिए।
3. पेट का फूलना- बासी, पुराना सड़ा हुआ चारा, फफूॅदी लगा हुआ दाना, अधिक मात्रा में हरा चारा खाने एवं दूषित पानी पीने के कारण बकरी का पेट फूल जाता है।
लक्षण- बकरी का पेट बायीं तरफ फूल जाना, मुंह से झाग आना, जल्दी-जल्दी सांस लेना, बेचैन होना और बार-बार उठना बैठना।
बचाव- चारा-दाना खिलाने से पूर्व उसकी स्वच्छता का ध्यान रखना, स्वच्छ पानी पिलाना। पेट फूलने पर बकरी को तारपीन का तेल एक चम्मच तथा चार चम्मच अलसी का तेल मिलाकर पिलाना चाहिए। मँंह में नीम की पतली दातून की लगाम चढड़ाना ताकि गैस मुंह के रास्ते निकल सके। तत्काल पशुचिकित्सक की सलाह लेना चाहिए।
4. थनैला- यह बीमारी थन में चोट लगने अथवा विषाणुओं के प्रकोप से होती है।
लक्षण- एक या दोनों थनों का कड़ा एवं आकार में बड़ा होना, सूजन के कारण थन का लाल हो जाना, थन में दर्द होना, बुखान आना तथा दूध में थक्कों का आना।
बचाव एवं उपाय- थनों की बर्फ की सेकाई अथवा ठण्डे पानी से धोना चाहिए। दूध निकालते समय थन को अधिक दबाना नहीं चाहिए। सावधानी के साथ बार-बार दूध बाहर निकालना चाहिए। पशु चिकित्सक की सलाह लेते हुए नियमित जांच एवं इलाज करवाना चाहिए।
5. बाह्य परजीवी- बकरियों में जूँं, किलनी, त्वचा पर फफॅूदी का होना, खुजली होना।
लक्षण - बार-बार खुजली होना, शरीर में रक्त की कमी होना, खाल में कड़ापन आना और शरीर से बदबू आना।
बचाव एवं उपाय- बकरी के शरीर को स्वच्छ गुनगुने पानी से पोछना, जूँं एवं किलनी के लिए पशु चिकित्सक की सलाह से औषधि का प्रयोग करना। कटी त्वचा पर एण्टीबायोटिक क्रीम का लेप लगाना।
6. अंतः परजीवी(लीवर फ्ल्यूक)- यह बीमारी एक परजीवी के कारण होती है, जो चरते अथवा दूषित पानी पीते समयय शरीर में प्रवेश करता है तथा वहां पहुंच कर संख्या में वृद्वि करता है।
लक्षण- बकरी के गले में सूजन का दिखायी पड़ना जिसमें पानी जैसा भरा हो। बार-बार दस्त होना आौर कमजोरी होना, शरीर में खून की कमी होना। चिकित्सा के अभाव में बकरी की मृत्यु हो जाना।
बचाव एवं उपाय- बकरी को चराने न ले जाना। घर पर रख कर खिलाना। तालाब एवं पोखर के पास नहींं चराना चाहिए। लक्षण दिखाई पड़ने पर तत्काल पशु चिकित्सक की सलाह से दवा पिलाना चाहिए।