ALL विशेष कविता सिंचाई समाचार कहानी पशुपालन कृषि बागवानी घाघ भण्डारी की कहावतें कृषि समाचार
जड़ों से जुड़े रहने की जरूरत
October 6, 2019 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ जब लोगों ने कृषि कार्य प्रारमभ किया तो उस दौर से लेकर अभी 60-70 वर्ष पहले तक जैविक कृषि का ही बोलबाला रहा पौष्टिक  सुस्वाद गुणवत्ता वाली कृषि उपज से लोग स्वस्थ एवं रोग मुक्त थे। बढ़ती आवादी के कारण बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के चक्कर  में हम इतने स्वार्थी हो गए कि अपनी और धरती माता दोनों की सेहत रासायनिक उर्वरकों  व कीटनाशकों का अन्धाधुंध  इस्तेमाल कर बिगाड़ लिया। यद्यपि कृषि में रसायनों का प्रयोग निरर्थक नही है खेतों में जैविक उर्वरकों का इस्तमाल भी अपरिहार्य है इसलिए रासायनिक (विषयुक्त) खेती से मुक्त पारिवारिक टिकाऊ जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाये।  हर्ष का विषय है कि भारत सरकार ने एक लाख गाँवों में जैविक खेती शुरु करने की पूर्ण तैयारी कर ली है। पूर्वोत्तर भारत का 'सिक्किम' राज्य देश का पहला शत-़प्रतिशत जैविक खेती वाला राज्य है। उसी के तर्ज पर अन्य राज्यों में भी जैविक खेती को बढ़ावा देने का फैसला लिया गया है। भारतवर्ष के सीमान्त एवं लघु कृषकों की औसत जोत क्रमशः मात्र 0.39 हेक्टेयर एवं  1.42 हेक्टेयर है, लेकिन  इन 85 प्रतिशत सीमान्त एवं लघु कृषकों के पास कुल क्षेत्र का मात्र 45 प्रतिशत क्षेत्रफल ही उपलब्ध है जबकि मात्र 4.9 प्रतिशत मध्यम एवं बडे़ किसानों के पास देश के कुल क्षेत्रफल का 32 प्रतिशत कृषि योग्य क्षेत्र पर अधिकार है। उत्तर प्रदेश की औसत जोत भारत के औसत जोत 1.15 हेक्टेयर  के सापेक्ष मात्र 0.76 हेक्टेयर  ही है। आज स्थिति यह है कि 50 लाख कृषक प्रतिवर्ष रोजगार की तलाश में शहर की ओर पलायन कर रहे है। पिछले 7 वर्षो में 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की है। एक रिपोर्ट के अनुसार 3 किसान प्रतिदिन बुन्देलखण्ड में, 5 किसान प्रतिदिन विदेशो में तथा 2 किसान प्रति घंटे भारत में आत्महत्या करते हैं। 2400 किसान प्रतिदिन कृषि कार्य छोड़ रहे हैं। यह स्थिति हमारे लिए एक गंभीर चुनौती है। गांधी जी के अनुसार, '' जिस खेती-बाड़ी के धन्धे पर तीन चैथाई भारतीयों की जीविका प्रत्यक्षतः निर्भर है, उसकी उपेक्षा आत्मघात से कम नहीं होगी। पण्डित नेहरू के अनुसार सब चीजें इंतजार कर सकती हें मगर खेती नहीं। समय की माँग है कि ''अधिकतम उत्पादन एवं उत्पादकता अधिकतम हाथों यानी 91: सीमान्त एवं लघु कृषकों के माध्यम से ही होना चाहिए''। टिकाऊ एवं जैविक पारिवारिक खेती के माध्यम से इन किसानों को प्रोत्साहन देना एवं उन्नयन करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। यह किसान ही हमारा अन्नदाता और आराध्य है।  राष्ट्र एवं प्रदेश हित में हमें छोटे एवं सीमान्त कृषकों को शीर्ष प्राथमिकता देनी ही होगी, कोई अन्य मार्ग है ही नहीं। देश की कुल आवादी 124 करोड़ की कुल सम्पत्ति का लगभग आधा मात्र चंद लोगों के पास सिमट गयी है, जबकि 40 फीसद लोग भूखे पेट सोने को विवश है। 30 फीसद के पास मकान के नाम पर मात्र धरती बिछावन और आसमान ओढ़ने के लिए है।  स्वतन्त्रता प्राप्ति के 70 वर्षां बाद भी इस देश के लगभग 80 प्रतिशत लोगों को संतुलित आहार उपलब्ध नहीं है। लगभग 2 करोड़ बच्चे अन्न के अभाव में भूख के कारण प्रतिदिन रोते हुए सो जाते हैं जबकि लगभग 65000 करोड़ रुपये का खाद्यान्न प्रतिवर्ष हमारे गोदामों में लापरवाही लालफीताशाही, भ्रष्टाचार एवं असम्वेदनशीलता के कारण सड़ या अनुपयोगी हो जाता है। इस देश एवं प्रदेश में सम्यक कृषि विज्ञान की शिक्षा के अभाव एवं जातिवाद के कारण विकास दर कम हुआ है तथा सामाजिक सौहार्द बिगड़ा है। इसके कारण भूमिहीन मजदूरों, सीमान्त एवं छोटे किसानों को आर्थिक-सामाजिक न्याय नहीं मिल रहा है। नैतिकता के अभाव में चारो तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला होने से प्रदेश एवं राष्ट्र की सम्यक् सर्वांगीण़ विकास बाधित हो रहा है। ऐसा नहीं है कि केवल भारत में ही किसानों की दुर्दशा है, पूरे विश्व में खेती किसानों का हाल एक समान है। अमेरिका में 91प्रतिशत  किसान परिवार, आय के अन्य स्त्रोतों पर निर्भर है। अमेरिका में किसान बिल 2014 में आगामी 10 वर्षो के लिए कृषि की मदद के लिए 962 अरब डालर की केन्द्रीय सब्सिडी का प्रावधान किया गया है। यूरोप में भी उनके कुल वार्षिक बजट का 40 फीसद कृषि क्षेत्र के लिए निर्धारित होने के बावजूद वहाँ प्रति मिनट एक किसान कृषि कार्य छोड़ रहा है। अमेरिका, यूरोप में 80 फीसद कृषि अनुदान वास्तव में कृषि व्यवसाय से जुड़ी कम्पनियों को जा रहा है। वहाँ किसान एक खत्म हो रही नस्ल बन गए है। अमेरिका एवं यूरोप के किसान जीवन निर्वाह भी नहीं कर पा रहे है। यहाँ किसानों में आत्महत्या की दर सामान्य आबादी की तुलना में कहीं बहुत अधिक है। चीन में पिछले दशक में, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले औसतन 2.80 लाख लोग आत्महत्या कर चुके है जिनमें अधिकाशंतः भूमि अधिग्रहण के शिकार हुए है। फ्रांस  में एक वर्ष में 500 किसानों के आत्महत्या करने की रिपोर्ट आई है। आयरलैण्ड, ब्रिटेन, रुस और आस्ट्रेलिया से किसान आत्महत्या करने को विवश हो रहे है।