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जैविक विधि से कीट - रोग प्रबन्धन
August 25, 2019 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय

आज कल यह प्रायः सुनने को मिला जाता हे कि हर खाने पीने की वस्तु जहरीली हो गई है। इसका प्रमुख  कारण यह है कि अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने और फसलों की सुरक्षा के लिए हम अधाधुध रासायनिक उर्वरकों  और फसलों में खर- पतवार नियंत्रण तथा रोग कीट प्रबंधन के लिए रासायनिक दवाइयों का इस्तेमाल करते  हैं जिसके फलस्वरूप खाने पीने की  वस्तुओं में जहरीले तत्वों का समावेष स्वाभाविक है। इसी लिए सरकार रासायनिक खेती की जगह जैविक खेती पर विषेश जोर दे रही है। जेविक कृशि उत्पादों का बाजार भाव भी सरकार अच्छा दे रही है मगर इसके विपणन और प्रचार प्रसार के जरिये और भी प्रोत्साहन देने की जरूरत है। षुरूआती दौर में यदि जैविक पद्धति से कृशि करने में उत्पादन कम मिलेगा तो मजबूत विपणन व्यवस्था प्रदान कर सरकार किसानों को हो रहे घाटे की भरपाई अच्छा भाव देकर कर सकती है।ं 
बात यदि फसल सुरक्षा की करें तो आज वैज्ञानिकों ने फसल सुरक्षा के तमाम गैर रासायनिक दवाओं और उपचारों की खेज कर लिया है जिनके जरिये फसलों की सुरक्षा करते हुए बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए फसलवार दवाओं /उपायों की व्यवस्था है जिसे अपना कर किसान बेहतर फसल उत्पादन प्राप्त कर सकते है। फसल प्रबंधन की इस व्यवस्था में विशाणुओं को विशणुओं से जीवाणुओं को जीवाणुओं और कीटाणुओं को कीटाणुओं से मारने अथवा नियंत्रित करने का इंतजाम है।
1. सूडोमोनास फ्लूरेसेन्स(Pseudomonas flurencence)जीवाणु
फसल:- धान, मक्का,दलहन,तिलहन, सब्जी
प्रयोग विधि:- सब्जियों में उकठा, जड़गलन रोग, धान की ब्लास्ट एवं शीथ ब्लाइट के नियंत्रण में कारगर।
व्यावसायिक नाम:- अनमोल सूडो, पी सुरक्षा।
2 बैसिलस थुरिंजिनिसिस (Bacillus thuringiensis)जीवाणु
 फसल:- चना, सब्जी 
प्रयोग विधि:- 1 किग्रा0/प्रति हे0 जैविक कीटनाशक को पानी में घोलकर शाम को छिड़काव करें।
व्यावसायिक नाम:- बायो लेप, बायो अस्प,डियो पेल, बायो बिट,हाल्ट
3 न्यूक्लीअर पाली हेड्रोसिसवायरस (N.P.V.)
फसल:- चना-एन0पी0 , वी0-एच, तम्बाकू- एन0 पी0वी0-एस0 एल0
प्रयोग विधि:- 250 एल0ई0 (संक्रमित सुंडियों)/हैक्टेयर की दर से पानी में मिलाकर शाम को छिड़काव करें। घोल में 2 किग्रा0 गुड़ मिलाने से बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे। गन्ने/गोभी में 1 किग्रा0 पाउडर 100 लीटर पानी में घोल कर प्रयोग करें।
व्यावसायिक नाम:- हेलीसाइड, बायोवायरस-एच,हेलमोसेल, बायो वायरस-एस, स्पोडो साइड, प्रोडेक्स
4 गे्रनुलासिस वायरस (जी0वी0)
फसल:- गन्ना, गोभी 
प्रयोग विधि:- 1 किग्रा0 पाउडर को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
5 ब्यूवेरिया बेसियाना (Beauvaria bassiana) फफुन्दी
फसल:- चना, सब्जी,धान
प्रयोग विधि:- चने की सुंड़ी, बालदार सूडी, रस चूसनेवाले कीट, वूली एफीड, फुदकों, सफेद मक्खी, स्पाइडर माइट के प्रबंधन हेतु प्रयोग करें।
व्यावसायिक नाम:- बायो रिन, लार्कों सील, दमन, अनमोल बाॅस ।
6 मेटाराइजियम एनीसोपली (Metarhizium anisopliae ) फफुॅंदी
फसल:- गन्ना, सब्जी 
प्रयोग विधि:-   मित्र फफूंदियों की 750 ग्राम स्टिकर एजेंट  के साथ 200 लीटर पानी में घोलकर 01 एकड़ क्षेत्रफल में सुबह/शाम में छिड़काव करें। सफेद गिडार के लिए 1800 ग्राम दवाई को 400 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
7 ट्राईकोडर्मा (Trichoderma viridae ) सूक्ष्म जैविक रोगनाशक फफुॅंदी


फसल:- दलहन, तिलहन, कपास, सब्जी, धान
प्रयोग विधि:-  

(अ) बीज शोधनः- 5-10 ग्राम पाउडर/किग्रा0 बीज
(ब) भूमि शोधनः 01 किग्रा0 पाउडर को कम्पोस्ट में मिलाकर बोरी से ढककर एक सप्ताह तक छोड़ दे। इस कम्पोस्ट को एक एकड़ खेत में मिला दें। खड़ी फसल पर छिड़काव 5-10 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर रोग के लक्षण दिखने पर छिड़काव करें।
व्यावसायिक नाम:- बायोडर्मा, निपराॅट अनमोलडर्मा, ट्राइको-पी
8 वरटीसिलियम लेकनाई (Verticillium lecani)सूक्ष्म जैविक रोगनाशक
फसल:- गेहूँं, सोयाबीन,मटर, राई/सरसों 
प्रयोग विधि:-  250 से 500 ग्राम फफूंद पाउडर को 200 से 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से पत्ती की निचली सतह पर छिड़काव करें।
व्यावसायिक नाम:- वर्ती सेल, वर्ती लेक तथा अनमोल वर्त
9 न्यूमेरिया रिलाई(Neumeria relai) फफूंदी
फसल:- चना, अरहर, गोभी
प्रयोग विधि:-  पाउडर को पानी में घोलकर संध्या काल में छिड़काव करें।
प्राकृतिक रूप से मौजूद कीटनाशी- नीम का तेल, नीम के पत्तों का रस, निबौली का रस, अरन्डी का तेल, मदार के बीज, पार्थेनियम (गाजर घास) के उपयोग से बहुत सारे कीट एवं बीमारियाॅ नियंत्रित हो जाती है।
ट्रैप फसलें-
ऐसी फसलें जो मुख्य फसल को कई किस्म के कीट और बीमारियों के प्रकोप से सुरक्षा प्रदान करती है, को
टैªप फसल कहते है। जैसे यदि किसी भी फसल में (निमेटोड) सुत्रकृमि का प्रकोप अधिक है तो ऐसी फसलों की
सुरक्षा के लिए मेंड़ों पर गेंदे के पौधे को लगाया जा सकता है, गेंदा का पौधा उस फसल हेतु ट्रैप फसल होगा।
आर्गेनिक मिल्क-
यदि कोई कृषक अपने देसी गायों को केवल प्रकृतिक रूप से उपलब्ध चारागाहों से चारा खिलाये या फिर
अपने खेत से उत्पादित चारे जिसके उत्पादन में किसी भी किस्म के रायासनिक उर्वरकांे/कीटनाशकों का
इस्तेमाल न हुआ हो तो इस प्रकार के पशुओं से उत्पादित उत्पाद को जैविक पशु उत्पाद कहा जाता है। प्रदेश के
कुछ ऐसे क्षेत्र भी है जहाँ पर दुधारू पशु भोजन के लिए केवल प्राकृतिक रूप से उपलब्ध चारागाहों पर निर्भर रहते
है और उन्हें किसी प्रकार की दवाईयाँ भी बाहर से नहीं दी जाती है। इस प्रकार के पशुओं द्वारा उत्पादित दूध या
दुग्ध उत्पादों को भी जैविक पशु उत्पाद कहा जाता है।