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कमाई का जरिया बन सकता है लिलियम
July 25, 2019 • डा. शरद प्रकाश पाण्डेय

परम्परागत कृषि को छोड़ व्यावसायिक खेती के जरिये अधिक लाभ कमाने की कोशिशें राज्य बनने के बाद काफी तेज हुई हैं। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र में जहाँ प्रति परिवार औसत 8  नाली कृषि भूमि बची है, वहीं ऊपर से बिखरी जोतों तथा जंगली जानवरों के नुकसान के चलते बंजर भूमि का क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में व्यावसायिक खेती ग्रामीणों का आर्थिक स्तर उठाने में बेहतर भूमिका निभा सकती है। लेकिन विभागीय खामियों एवं अधिकारियों की संवेदनहीनता के चलते काश्तकार कर्ज में डूब रहे हैं। इससे प्रगतिशील किसान निराश हैं।

                     
मगर अल्मोड़ा जनपद के हड़ौली निवासी प्रभाकर भाकुनी ने हालैंड मूल के सुगन्धित पुष्प लिलियम का सफल उत्पादन कर प्रेरक कार्य किया है। ठंडी जलवायु का यह पुष्प भारत में केवल पर्वतीय राज्यों में होता है। केन्द्रीय पुष्पों में लिलियम का विश्व में तीसरा स्थान है। अपनी विशेष खुशबू के कारण भारतीय पुष्प मंडियों में इसकी बड़ी मांग है। बावजूद इसके, वांछित विभागीय सहयोग न मिल पाने के कारण भाकुनी को उनके परिश्रम का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। प्रभाकर भाकुनी शिक्षित बेरोजगार हैं। आजीविका के लिए 3 वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी पुश्तैनी भूमि में लिलियम की खेती का निर्णय लिया। इसके लिए 2009 में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड देहरादून की मदद से बैंक से 2.25 लाख रुपया ऋण लेकर कार्य प्रारम्भ किया। 697 वर्गमीटर सेडनैट हाउस का निर्माण कर लिलियम के 12  हजार बल्ब लगाये। उनके अथक परिश्रम के बदौलत पैदावार काफी अच्छी हुई है, लेकिन बाजार पर नियंत्रण न होने से उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। भाकुनी ने बताया कि बाजार में प्रथम ग्रेड का पुष्प की कीमत 40 से 50 रुपया प्रति फूल है, जबकि उन्हें इसका मात्र 3 से 10 रुपया ही मिल पा रहा है। यही नहीं, ऋण सब्सिडी, मैचिंग ग्रांट राज्य सहायता 77,520 रुपया अभी तक नहीं मिल पायी है। बैंक ब्याज बढ़ने से वे चिन्तित जरूर हैं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है। उनका कहना है कि यदि सरकार ईमानदारी से इस दिशा में काम करे तो लिलियम की खेती पहाड़ के किसानों के जीवन को बदल देगी। उनके अनुसार 4 नाली जमीन पर इसकी खेती कर 3 लाख रुपया वार्षिक आय प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराना, काश्तकार को उसकी सब्सिडी का भुगतान समय पर करना, कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था तथा फसल का समय पर बीमा जैसे कदम सरकार को उठाने होंगे।